रविवार, 19 नवंबर 2017

मिर्गी के रोग का शर्तिया ईलाज

        मिर्गी के रोग का  शर्तिया ईलाज

         


मिर्गी का रोग एक दिमागी रोग है । इस रोग में आदमी अचेत ( बेहोश ) होकर गिर जाता है । इसका दौरा सड़क के बीच , खतरनाक स्थान , या किसी वाहन में , जहां अधिक पानी हो या आग हो वहां पर उस व्यक्ति का दिमाग काम करना बंद कर देता है और मिर्गी का दौरा पड़ जाता है ।उस समय लोग रोगी को घेर लेते है । कुछ लोग सहानुभूति दिखाते है । तो कुछ लोग इधर - उधर की बाते करने लगते है । उसे चमड़े की जूते सुंघाने लगते है । जिसे रोगी हीन भावना का शिकार हो जाता है ।
       इस रोग को घरेलू उपचार से ठीक किया जा सकता है जो इस प्रकार से है ।

 उपचार विधि :- 

पहली विधि -

( 1 ) अदरक का सोंठ - 10 ग्राम
( 2 )पीपल ( किराने के दुकानों पर आसानी से मिल जाती है ) - 10 ग्राम
( 3 )काली मिर्च :- 10 ग्राम

 इन तीनो चीजो को शुद्ध घी में भून लें । तीन ग्राम भुनी हुई हींग ले । इन चारों का चूर्ण बनाले । सुबह शाम तीन - तीन चुटकी फांक कर गाय का दूध पी ले । कुछ ही दिनों में मिर्गी का रोग ठीक हो जाएगा ।

दूसरी विधि :- 

अदरक के  सोठ का चूर्ण दो चम्मच , तुलसी दल पांच पत्तियां , काली मिर्च के दस दाने को पीस ले । फिर इसे शहद के साथ सेवन करे ।
 इसके सेवन से दिमाग की चेतना लौटेगी और रोग धीरे - धीरे समाप्त हो जाएगा ।

मंगलवार, 6 जून 2017

चीनी ( सुगर ) का शर्तिया ईलाज

           चीनी ( सुगर ) का शर्तिया ईलाज 

सामग्री -

( 1 ) लहसुन छिला हुआ 25 ग्राम

( 2 ) अदरक ताजा 50 ग्राम 

( 3 ) पुदीना ताजा 50 ग्राम

( 4 ) अनार दाना खट्टा 50 ग्राम 


         इन चारों समाग्री को पीस कर चटनी बनाले ,और सुबह दोपहर और शाम को एक एक चम्मच चाट ले ।इसे पुरानी से पुरानी सुगर ठीक हो जायेगी ।यहाँ तक शरीर के किसी अंग का घाव चीनी के कारण ठीक नही हो पाता है  वह भी ठीक हो जाता है ।

रविवार, 11 दिसंबर 2016

प्याज के गुण

                                   प्याज के गुण

पेट के गैस की वीमारी में प्याज का सेवन काफी लाभकारी होता है 


प्रकृति का वरदान है प्याज । प्याज मनुष्य के स्वास्थ के बहुत ही फायदेमन्द है । आज के दुनिया में शायद ही कोई होगा जो प्याज को नही जानता होगा । यह शरीर को चुस्त दुरुस्त बनाता है बल्कि मेहनत करने वालो को शक्ति प्रदान करता है । आयुर्वेद के अनुसार प्याज में कब्ज , बवासीर , भूख न लगना , चर्मरोग, नामर्दी आदि रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है । गर्मी के दिनों में लू लगने और हैजा से रक्षा करने में प्याज से ज्यादा उपयोगी कुछ नही है । इसलिए इसे प्रकर्ति का वरदान कहा गया है । यही वजह है कि आज लगभग हर घर में प्याज का भरपूर प्रयोग किया जाता है ।
        प्याज पूरे विश्व में पाया जाता है इसे अलग अलग जगहों पर अलग अलग नामो से जाना जाता है । इसे हिंदी में प्याज , मराठी में कांदा , बंगला में पेयाज , पंजाबी में गांडा , गुजराती में कांदो , अरबी में वसूल और अंग्रेजी में ओनियन ( ONION) का नामो से जाना जाता है ।
       प्याज में जल लगभग 86%, प्रोटीन 1.2 प्रतिशत ,वसा 0.1%, कैल्शियम 0.18% , कार्बोहाड्रेट 11.6% , फास्फोरस 0.06% , आयरन 0.12% , पाये जाते है ।
साथ ही प्याज में एक उड़नशील तैल होता जिसमे गन्धक , लिग्निट , एल्ब्युमें , पर्सफुटक अम्ल , लार चूने  के सिट्रेट आदि तत्व होते है । यही कारण है की जब प्याज को काटा जाता है तो आँखों में आंसू आजाते है ।
    प्याज में पाये जाने वाले तत्व शरीर के लिए बहुत ही उपयोगी है ।कैल्शियम हड्डी के लिए , आयरन रक्तल्पता में , क्लोरीन सन्धियों और मांसपेशियों के लिए गन्धक चर्मरोग  में , आयोडीन घेंघा में , विटामिन '  ए '  संक्रामक रोगों में विटामिन 'c'  दांतो के रोग , गठिया  आदि में लाभदायक है । प्याज के नियमित सेवन से इन रोगों से पूरा वचाव हो जाता है ।

   गैस ( Flatulence )

गैस की वीमारी में प्याज का सेवन बहुत ही लाभकारी होता है ।
  घी - तेल मशाला आदि की अधिक सेवन , उल्टा सीधा खाना , पुरानी कब्ज , अधिक समय तक बैठ कर काम करना , समय बेसमय पर खाना खाना , रात में देर रात तक जगाना आदि कई कारणों से गैस बनने लगता है । धीरे धीरे गैस अनेक विमारियो का कारण बन जाता है ।

प्रयोग विधि - 

(1) प्याज , अदरक और लहसुन तीनो की चटनी बनाकर सेवन केरने से पेट की गैस धीरे धीरे ठीक हो जाता है ।
 ( 2 ) एक चम्मच प्याज के अर्क में थोड़ा सा काला नमक डालकर सेवन करने से गैस में काफी लसभ मिलता है ।

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

अदरक द्वारा पेट संबन्धी रोगों का उपचार

अदरक द्वारा पेट संबन्धी रोगों का उपचार उपचार विधि :- ( 1 ) अदरक को कूटकर एक चम्मच रस निकाल ले । इस रस में एक चुटकी सेंधा नमक डालकर ऊँगली से धीरे - धीरे चाटे । एक साथ कभी न खाये बरना गला में खुश्की का फन्दा लगने का डर रहता है । एक एक बून्द चाटने से पेट में लार भी पहुँचेगी जो पेट में जलन को कम कर देती है परन्तु पाचन क्रिया को ठीक कर देती हैं । ( 2 ) भोजन के बाद एक चम्मच अदरक का रस एक ग्लास पानी में एक निम्बू के रस को डाल कर पी लें । इसे भोजन पचने में सहायता मिलती है और अपच नष्ट हो जायेगी ।

शनिवार, 2 जुलाई 2016

गले के टाँसिल के कारगर घरेलू उपचार

गले के टाँसिल के कारगर घरेलू उपचार 


अधिकांशतः सर्द - गर्म  या जाड़े के समय में गले में ठण्ड लग जाने से टॉन्सिल बढ़ जाता है ।टाँसिल के  ज्यादा बढ़ जाने पर खाने में प्रोबलेम होता है गला दर्द करने लगता है , कभी - कभी बुखार भी हो जाता है । गला सूज जाता है ।

उपचार

    प्रथम विधि :-   इसके लिए अदरक कुचल कर थोड़े से सरसो के तेल में गर्म इसे गले पर लेप कर मुलाय  कपड़ा से पट्टी बाँध ले । धीरे - धीरे  सारी सूजन ठीक हो जायेगी ।

         दूसरी विधि :- एक चुटकी अदरक के सोंठ , एक चुटकी हल्दी और एक पुती लहसुन को एक कप पानी में औंट कर पिजाये । इसे टाँसिल ठीक हो जाती है । अदरक का सोंठ त्वचा को सुखाने की काम करती है और हल्दी और लहसुन दर्द को ठीक करने का काम करता है ।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

एसिडिटी या अम्ल पित्त ( गैस ) का अदरक द्वारा शर्तिया घरेलू उपचार

एसिडिटी या अम्ल पित्त ( गैस ) के रोग का अदरक द्वारा शर्तिया घरेलू उपचार


आजकल यह रोग घर - घर देखे जाने लगे है आयुर्वेद में एसिडिटी को अम्लपित्त कहते है । इस रोग में उदर में अम्ल के तत्व बढ़ जाते है तथा शरीर पर पित्त का प्रकोप होने लगता है । जो लोग गरिष्ठ भोजन , चाट - मसाले , खटाई अधिक मात्रा में खाते है वे लोग इस बिमारी के ज्यादा शिकार होते हैं । मानसिक कार्य करने वाले , देर तक बैठ क्र काम करने वाले , पाखाना - पेशाब देर तक रोकने वाले व्यक्ति भी इस रोग के शिकार हो जाते हैं। चिंता , दुःख , अशांति आदि कारण से भी व्यक्ति को गैस या एसिडिटी , अम्ल पित्त जैसा रोग होजाता है । यह रोग देखने में साधारण होता है पर यह रोग बहूत ही भयानक होता है ।

      लक्ष्ण -  ( 1 ) पेट में गैस बनना ,  ( २ )  त्वचा पर खुजली होना ( 3 ) पेट फूल जाना तथा बार - बार डकार आना ( 4 ) हाथ - पैरों  से पसीना आना ( 5 )  जब गैस की अधिकता हो जाती है तो बार बार डकार आती है एवं नींद नही आती है । ( 6 )  कभी कभी गैस की अधिकता के कारण गला घुटने लगता है ।


उपचार विधि - 

( 1 ) अदरक का सोंठ 25 ग्राम एवं सुखा धनिया 25 ग्राम । दोनों को महीन पीस कर दो कप पानी में आग पर रख दे । जब पानी पक कर एक कप हो जाए तो इसे दिन भर में तीन बार पियें । इसे पेट की सारी अम्ल निकल जायेगी ।

 ( 2 )  सोंठ 5 ग्राम धनिया10 ग्राम दोनों को पीस कर शहद के साथ दिन में तीन बार चाटे ।इसे प्रयोग से तीन चार दिनों में ही अम्ल या गैस छूमन्त्र हो जाता है ।

 परहेज :-  गरिष्ठ भोजन न खाये , खाली पेट न रहे इसके लिए समय पर भोजन करे ।भोजन में तेल , घी , मसाला का का प्रयोग ना मात्रा का ले । सुबह - शाम हरी घास पर टहले एवं हल्का व्यायाम करे ।

गुरुवार, 30 जून 2016

आवाज फट जाने या बैठ जाने पर अदरक राम बाण की तरह काम करता है ।

आवाज फट जाना या बैठ जाने पर अदरक राम बाण की तरह काम करता है ।


 जब किसी भी गायक का आवाज बैठ जाय तो अदरक का प्रयोग जरूर करनी चाहिए ।


कभी- कभी अत्यधिक ठण्ड   या अधिक गर्मी , ठंडा - गर्म पानी या पेय पदार्थ  पिने से आवाज बैठ जाता है ( गला बैठ जाता है ) । कभी कभी ऊँची आवाज या अत्यधिक बोलने से आवाज बैठ जाता है , ऐसा समस्या अधिकांशतः  गायक ( सिंगर ) के साथ आता है ।
इसे दूर करने के लिए अदरक अचूक दवा है ।

प्रयोग विधि - 


( 1 )
एक गाँठ अदरक को लेकर उसे चटनी की तरह पीस ले और उसमे दो लवंग और थोड़ी सी हींग को पीस कर मिला दे । फिर उसे शहद के साथ चाटे ।
 कैसी भी बैठी हुई आवाज क्यों न हो , तुरन्त ठीक हो जायेगी ।

(२) 100 ग्राम सौंठ , 2 ग्राम हींग एंव 4 ग्राम लौंग को पीस कर उसमे एक चुटकी नमक डाले ।फिर उस चूर्ण को सुबह शाम हल्का गर्म पानी से ले । गला तुरन्त ठीक हो जाएगा।

( 3 ) अदरक के रस को शहद के साथ लेने से यह छाती में जमे बलगम को निकालने में राम बाण की तरह काम करता है ।

मंगलवार, 7 जून 2016

अदरक नस नाड़ियो को स्वच्छ कर पुरुषो के मर्दानी ताकत को बढ़ाता है ।अदरक में पुंसत्व की शक्ति होती है । अदरक ( आदी ) नामर्दो को मर्द बनाती है ।

अदरक नस नाड़ियो को स्वच्छ कर पुरुषो के मर्दानी ताकत को बढ़ाता है ।अदरक में पुंसत्व की शक्ति होती है । अदरक ( आदी ) नामर्दो को मर्द बनाती है ।

        अदरक का जन्म धरती की गर्मी में एक जड़ के रूप में होता है ।लेकिन यह मानव जीवन को प्राण वायु देती है ।इसकी जड़ में ऐसी अदभुत शक्ति होती है जो सैकड़ो रोगों को पछाड़ कर मानव शरीर में ऊर्जा प्रदान कर देती है । इसके सेवन से यह छाती में जमे हुए कफो को निकाल कर यह नसों को धो देती है ।यह सांसो से दुर्गन्ध को निकाल देती है । यह नस नाड़ियों में जमे श्लेष्मा को निकालकर साफ़ कर देती है ।इस प्रकार अदरक एक ओर शरीर में प्राण वायु का संचार करती है तो दूसरी ओर अशुद्द वायु को धक्के देकर बाहर कर देती है । इसके साथ ही अदरक के सेवन से पुरुषो में सांड की तरह शक्ति आजाती है ।आजकल पौरुष बल बढ़ाने के सैकड़ो दवाये चल गयी है ।डाक्टर , बैध , हकीम लोगो को मर्दानी ताकत बढ़ाने के नाम पर खूब ठगाई करते है ।नासमझ व्यक्ति इनके चंगुल में फस कर धन के साथ साथ अपने प्राकृतिक पौरुष बल को भी खो देते है ।ऐसे लोगो को अदरक का प्रयोग करनी चाहिए इसे उनका पौरुष बल सौ गुना बढ़ जायेगा ।इस प्रकार अदरक नामर्दो को मर्द बनाती है ।अदरक जिगर के खराबी को ठीक कर उसे शक्तिशाली बनाती है ।यह रक्त की सफाई कर देती है । यही शुद्ध रक्त जब यौननेंद्रियों में जाई है तो मनुष्य का मर्दानी ताकत किलकारी मारकर कूदने लगता है ।चरक ने लिखा है क़ि अदरक में सांड की तरह शक्ति होती है । अतः हमे इसकी शक्ति को पहचाननी चाहिए ।
   प्राचीन आयुर्वेद शास्त्रियों ने अदरक को बलवर्द्धक बताया है ।यूरोप में प्रतिवर्ष भारत से ही हजारो टन अदरक जाता है ।यूरोपवासी इसे इंडियन जिंजर कहते है ।वे लोग इसका प्रयोग प्रयोग टॉनिक या स्वास्थ्यवर्धक औषधि के रूप में करते है । इसके खाने से मनुष्य का वदन गठीला और ताकतवर बनजाता है जिसे मनुष्यो में अपने आप पौरुष बल बढ़ जाता है ।पुरुषार्थी वह होता है जो साहस के साथ कठिनाइयों को जीतते हुए आगे बढ़ता है ।अदरक व्यक्ति को एसे ही जीवन जीने की शक्ति स्फूर्ति प्रदान करती है । आज इसका महत्व सारा संसार में है ।शरू में यूरोप और अफ़्रीकी देशो में इसके प्रयोग सिर्फ पौरुषबल बढ़ाने के रूप में किया जाता था पर अब धीरे - धीरे इसके अन्य उपयोगो से भी वे परिचित हो गए । आज थोड़ी बहुत अदरक सभी देशो में पैदा होती है । इससे अनेको मूल्यवान दवाइयाँ भी बनने लगे है ।पता नही अदरक के खाने से हम मुँह क्यों बिचकाते है ?
   प्रयोग बिधि - इसका सेवन चटनी , आचार या सब्जी में किसी भी तरह करे यह फायदा ही पहुचाता है ।
  रात्रि को सोते समय एक चम्मच सोंठ अदरक दो , पिसी हुई लवंग और थोड़ी सी मिश्री को खा कर ऊपर से एक ग्लास दूध पिले । इसे नामर्दी दूर हो जाती है ।

   

रविवार, 5 जून 2016

यौन शक्ति बढ़ाने के घरेलू उपाय  , सफेद प्याज के मुरब्बा यौन शक्तिबर्धक

यौन शक्ति बढ़ाने के घरेलू उपाय 

यौन शक्तिवर्धक सफ़ेद प्याज का मुरब्बा।



प्याज एक प्राकृतिक यौन शक्ति वर्धक और शीघ्रपतन को दूर कर स्तम्भन बढ़ाने वाला हैं। सफ़ेद प्याज का प्रयोग एक ऐसा प्रयोग है जो एकदम सस्ता हैं और जिसको आप प्रतिदिन प्रयोग करके 80 साल की आयु में भी अनेको स्त्रियों के साथ रमण कर सकेंगे। कमज़ोरी नाम क्या होता हैं सब भूल जायेंगे।
   
    प्याज के मोरब्बा बनाने की बिधि


सफ़ेद प्याज – पैतालीस 45 पीस
शुद्ध शहद – आवश्यकतानुस

सर्वप्रथम सफ़ेद प्याज का छिलका उतार लीजिये, अब इन प्याज में किसी सलाई की मदद से बीच बीच में 8-10 छेद कर दीजिये। सभी प्याज में ऐसे छेद कर लीजिये। और इन सब प्याज को एक कांच के बर्तन में डालकर रख लीजिये। कांच का बर्तन तीन चौथाई तक भरे। अब इस बर्तन को शुद्ध शहद से पूरा भर दीजिये। इसको 45 दिन तक ढक कर रख लीजिये। 45 दिन बाद आपका बेजोड़ यौन शक्ति वर्धक प्याज का मोरब्बा तैयार हो जायेगा।



सेवन विधि।

प्रति दिन रात को सोने से १ घंटा पहले ये बना हुआ मुरब्बा एक पीस खा लीजिये। इसको प्रतिदिन खाने से आप में घोड़े से भी ज़्यादा बल आ जाएगा। शरीर में खून की आपूर्ति हो जाएगी। चेहरा लाल टमाटर जैसा खिल जायेगा। और बुढ़ापे का अनुभव तो कभी नहीं होगा। सदा जवान रहेंगे।

सावधानी।

खट्टी चीजो, फ़ास्ट फ़ूड, कोल्ड ड्रिंक्स, धूम्रपान, शराब आदि का सेवन ना करे। इस प्रयोग का सम्पूर्ण फायदा लेने के लिए प्रयोग काल के प्रथम 25 दिन सम्भोग नहीं करना। उसके बाद भले निरंतर सम्भोग करते रहे। इस से ऐसी ताक़त मिलेगी जिसके आगे सब दवाये फेल हैं। और मन सदैव शांत रखे, हमेशा स्त्री गमण के बारे में सोचने से धातु कमज़ोर होती हैं और शक्ति का नाश होता हैं। अधिक सहवास करना सेहत के लिए नुकसानदेह हैं। शरीर से ओज तेज़ का नाश होता हैं। ये प्रयोग उन लोगो के लिए ही बताया हैं जो लोग अपनी शादी शुदा ज़िंदगी से परेशान हैं। और बचपन की गलतियों की वजह से अपना जीवन नरक समान बना लिया हैं।
       निरन्तर सेवन के लिए 45 दिनों के इसी तरह पुनः बनाले ।




शुक्रवार, 3 जून 2016

अदरक (आदी ) मनुषयो को युवा बनाती है , साथ ही आँखों को चमक देती है ।

अदरक (आदी ) मनुषयो को युवा बनाती है , साथ ही आँखों को चमक देती है ।

     अदरक के सेवन से मनुष्य सर्वदा युवा बना रहता है ।


             अदरक के अनेको फायदे है समय के साथ - साथ स्त्री - पुरुष दोनों वृद्धावस्था को प्राप्त होते है । स्त्री शरीर से होती है एवं पुरुष मन से परन्तु जो स्त्री - पुरुष अदरक का सेवन किसी न किसी रूप में करते रहते है । वे देखने में भले ही बूढ़े लगने लगे पर भीतर से वे युवा होते है । सचमुच वे दीर्घायु होते है क्योकि अदरक रोगों को भगाती है । जब शरीर रोगों से रहित होगा तो बूढ़ा भी क्यों होगा ? अदरक खाने से त्वचा का चिकनापन बढ़ता है । शरीरी के सभी अंग सुचारू रूप से काम करते रहते है । मन को निर्मल बनाने में भी अदरक का बड़ा हाथ होता है ।अदरक के " सेंटिनलतत्व " शरीर के अंदर काम करने वाले मशीनों को लुब्रिकेशन प्रदान करता है । अदरक के सेवन से शरीर हल्का एवं शांत रहता है ।

             अदरक नेत्रो को चमकीला बनाता है ।यह बात बिलकुल सत्य है की हम दाल , सब्जी , चाट आदि में अदरक डालते है तो यह केवल स्वाद न बढ़ाकर आंतो को दुरुस्त रखती है । जब आंत ठीक रहता है तो माथा स्वस्थ रहता है । माथा मुख का अंग है जो आँखों को किरण प्रदान करता है ।इसलिए अदरक के सेवन से आँखों की रौशनी बरकरार रखती है । इसलिए अदरक को खाने में निश्चित रूप से सेवन करनी चाहिए ताकि यह पेट को ठीक कर आँखों को बल प्रदान करे । इसतरह अदरक के सेवन के अनेको फायदे है ।

गुरुवार, 26 मई 2016

अदरक के गुण - सैकड़ो रोगों का दूर भगाता है अदरक , निमोनिया में अदरक ( आदी ) बहुत ही लाभकारी होता है ।

अदरक के गुण - सैकड़ो रोगों का दूर भगाता है अदरक , निमोनिया में अदरक ( आदी ) बहुत ही लाभकारी होता है ।


  अदरक का पौधा चौड़ी पत्ती वाला हरे रंग का होता है । परन्तु अदरक की जड़े जमीन के भीतर चौड़ी गाँठ के रूप में होती है । इसका स्वाद कुछ तीखा होता है । इसके जड़ को सुखा कर सोंठ बनालेते है ।सोंठ और दोनों की गुण धर्म अलग - अलग होता है ।
   भिन्न - भिन्न जगहों पर इसे भिन्न भिन्न नामो से जाना जाता है । लैटिन में इसे जिंजीवर ऑफिनेलिस कहते है ।कोई इसे श्रृंगवेर कहता है तो कोई इसे सवशतक तो इसे भद्र तो कहीँ इसे विश्वऔषध , कर्म कल्याणी , आदी , विश्वापुरा नामो से जाना जाता है ।

    अदरक के प्रयोग से पेट का दर्द , खांसी , जुकाम , लकवा , गठिया , निमोनिया , नपुंसकता , शरीर को झुक जाना , गला का बैठ जाना , हिस्टीरिया आदि अनेको रोग ठीक हो जाता है ।
 यह धरती का सबसे सस्ता एवं सुलभ औषधि माना जाता है । यह रामवाण की तरह काम करता है ।
 
    निमोनिया में :- अकसर छोटे बच्चों को निमोनिया हो जाता है । अदरक के प्रयोग से निमोनिया में बहुत ही लाभ मिलता है ।सरसो के तेल में सोंठ का चूर्ण मिलाकर उसे आग पर खौला ले । फिर इसे ठन्डा करके रोगी के छाती पर मले ।इसे रोग को बहुत ही लाभ मिलता है ।

रविवार, 20 मार्च 2016

नीम -मधुमेह ( चीनी ) या डायबिटीज के बिमारी का दुश्मन है ।

नीम -मधुमेह ( चीनी ) या डायबिटीज के बिमारी का दुश्मन है ।

             इस बिमारी में रोगी को नीम की छाल की काढ़ा पीनी चाहिए । 50 ग्राम निम के छाल को एक कप पानी में औट ले ।आधा कप रह जाए तो इसे छान कर सुबह पीले । इस रोग में करेले की सब्जी लाभदायक होता है ।खान पान में सयंम रखे । मधुमेह में खजूर जरूर खानी चाहिए ।क्योंकि खजुर में मधुमेह को नष्ट करने की शक्ति होती है ।यधपि खजूर मीठा होता है पर खजूर में मधमेह को दूर करने के गुण पाये जाते है । अतः खजूर का सेवन सात्विक भोजन करने बाद ही करनी चाहिए । एक बार में 100 ग्राम से अधिक नही खानी चाहिये । खजूर खाने के बाद पानी नही पीनी चाहिए ।पर कुल्ला जरूर कर ले ।इस तरह कुछ दिनों तक नीम के काढ़े के सेवन से मधुमेह कन्ट्रौल हो जाता है ।

शनिवार, 19 मार्च 2016

कुष्ट रोग ( कोढ़ ) का नीम के प्रयोग से अचूक ईलाज ।

कुष्ट रोग ( कोढ़ ) का नीम के प्रयोग से अचूक ईलाज ।


नीम का पानी पीया जाय तो कुष्ठ रोग पास फटक नही सकता है ।आज भारत में लगभग तीस लाख से अधिक व्यक्ति कुष्ठ रोग से ग्रसित है ।ये लोग जब एलोपैथिक दवा करके हार गए उन्हें कुछ फायदा नही हुआ वे नीम का सहारा लिए और वे कुष्ठ रोग से निजात पा गए ।जिन लोगो को कुष्ट रोगों का शिकायत है उन्हें नीम का भपका - जल सेवन करना तथा कुष्ठ जनित अंगो पर लगाना चाहिये । चरक , सुश्रुत आदि आयुर्वेद के शाश्त्रो निम् को कुष्ठ रोग नाशक औषधि बताया है ।आज हजारो बैज्ञानिक निम पर तरह तरह के परीक्षण कर रहे है ताकि उनके हाथ कोई अनमोल मोती लग जाय और वे मानव जाती का उपकार कर सके । नीम का पानी रोज पिने से पेट का कीड़ा मर जाता है ।आज बैज्ञानिक मानने लगे है की निम् के जड़ से लेकर फुनगी तक अनमोल है ।
         
             कुष्ठ रोग को पहले छूत का रोग मानते थे पर आज साबित हो गया है कि कुष्ठ रोग छूत का रोग नही है ।यह त्वचा पर अपरजीवी जीवाणु के कारण होता है । कोढ़ का लक्ष्ण दिखाई देते ही रोगी को निम्नलिखित प्रयोग करनी चाहिए ।

 प्रयोग विधि :-

( 1 ) नीम के तेल से शरीर को मालिस करे ।

( 2 ) नीम के पत्ती के रस एक चम्मच प्रतिदिन सुबह ले ।

( 3 ) नीम के फूल को शहद के साथ चटनी की तरह चाटे ।

( 4 ) नीम की हरी सींकों को जलाकर उनकी राखो को नीम के तेल में मिलाकर कोढ़ वाले स्थान पर लगावे ।

( 5 ) नीम के फूल को पीसकर शर्बत में डालकर पिले ।इसे लगभग एक दो माह तक पिने से कोढ़ ठीक होने लगता है ।

( 6 ) नीम के गोंद को आंच पर पिघला ले । फिर इसे नीम की पत्तियो के रस में मिलाकर कोढ़ पर मिलाएं ।

( 7 ) नीम के पानी में रोज दो घण्टे तक हाथ पाँव को भिगोये रखे ।कुछ ही दिनों में कोढ़ ठीक होने लगेगा ।

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

नीम के सेवन से हर्निया का नामोनिशान मिट जाती है 

नीम के सेवन से हर्निया का नामोनिशान मिट जाती है 


जिस व्यक्ति का अंडकोष बढ़ जाता है बोल चाल की भाषा में उसे हर्निया कहते है । अंडकोष के बढ़ जाने से बहुत ही तकलीफ होती है । यह रोग अनेक कारणों से होता है ।ज्यादतर यह रोग उन्ही लोगो को होता है जो लोग शरीर से मेहनत कम करते है आराम पसन्द होते है ।ज्यादतर यह रोग सेठ लोगो को होता है ।इसमें आंतो में विस्तार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।इसे अंडकोष बढ़ने लगते है । इसके बढ़ जाने से असहनीय पीड़ा होता है ।इसके लिए नीम का सेवन करे तो सारा कष्ट दूर हो जाता है ।

प्रयोग विधि :- 

 नीम की पत्ती 25 ग्राम एवं अमरबेल दोनों को गोमूत्र या बकरी के दूध में पीस कर मल्हम बनाले एवं अंडकोष पर लगाये ।एवं भोजन सादा एवं सुपाच्य ले । लाल मिर्च , तेल , खटाई आदि का सेवन न करे ।इसके साथ ही कब्ज बनाने वाली भोज्य पदार्थो को न खाये ।क्योंकि कब्ज से वायु बनता है और इसे आतं को कष्ट होता है ।इस मल्हम के लेप से कुछ ही दिनों में हर्निया ठीक हो जाता है ।

गुरुवार, 17 मार्च 2016

पेचिश की बिमारी में नीम का सेवन बहुत ही लाभप्रद होता है

पेचिश की बिमारी में नीम का सेवन बहुत ही लाभप्रद होता है


पुरानी से पुरानी पेचिश की बिमारी नीम के सेवन से ठीक हो जाता है ।
   
          पेचिश की बिमारी में पेट में ऐठन होती है ।ऐठन के साथ साथ ऑव आता है ।पेचिश के रोगियों  को पेट ऐठ कर बार बार दस्त लगती है ।आंतो में दर्द होने लगती है ।रोगी को बार बार दस्त होने से कमजोर हो जाता है उसे बचैनी होने लगती है ।आंते खुश्क हो जाते है ।प्रायः वासी भोजन करने या दूषित पानी पीने से पेचिश की बिमारी होती है ।

 इस बिमारी में निम्नलिखित उपचार करें ।

( 1 ) नीम के सफेद छाल को भून कर कूट कर चूर्ण बनाले ।फिर उस चूर्ण को दही के साथ कुछ दिनों तक सेवन करे । पेचिश ठीक हो जायेगी ।

( 2 ) नीम के पांच निबौली को मठ्ठे के साथ पिले पेचिश तुरन्त ठीक हो जायेगी ।

( 3 ) नीम के फूल को सुखा ले । और लगभग 5 ग्राम फूल को मठ्ठे के साथ सेवन करे । पुरानी से पुरानी पेचिश ठीक हो जायेगी ।

बुधवार, 16 मार्च 2016

रक्त चाप ( ब्लड प्रेशर ) के रोगियों के लिए रामबाण है नीम 

रक्त चाप ( ब्लड प्रेशर ) के रोगियों के लिए रामबाण है नीम 

 
संसार में शायद ही कोई औषधि का पेड़ है जो निम् के पेड़ की बराबरी कर पाये । निम् के पेड़ के जड़ से लेकर फुनगी तक औषधि के काम में आता है । नीम के कण - कण में मनुष्य के स्वास्थ्य प्रदान करने के तत्व भरे है । यह रोगों का दुश्मन है । इसके सेवन से रक्त चाप ( हाई ब्लडप्रेशर या लो ब्लडप्रेशर ) ठीक हो जाता है ।

प्रयोग विधि :- यदि व्यक्तो को हाई ब्लडप्रेशर हो तो दो चम्मच नीम के रस को सुबह में खाली पेट देनी चाहिए ।एक सप्ताह के सेवन से ही उच्च रक्तचाप सामान्य अवस्था में आ जाएगा । 

         यदि लो ब्लडप्रेशर हो  तो नीम के तेल से शरीर को अच्छी तरह से मालिश करनी चाहिए । मालिश के एक से दो घण्टे के बाद स्नान करनी चाहिए ।नीम के तेल के प्रयोग के बाद स्नान में साबुन का प्रयोग नही करनी चाहिए ।नीम के तेल से मालिश से शरीर में चिरमिरौटी होती है इसे घबराना नही चाहिए ।कुछ देर बाद अपने आप ठीक हो जाती है । कुछ ही दिनों के मालिश से लो ब्लडप्रेशर सामान्य हो जाता है ।निम् के प्रयोग काल में हल्की भोजन , फल अधिक सेवन करनी चाहिए । अगर दूध ले बराबर पानी मिलाकर दूध ले ।

सोमवार, 14 मार्च 2016

नीम लाख रोगों का एक दवा है 

नीम लाख रोगों का एक दवा है 


यह सत्य है की नीम लाख रोगों का अकेली दवा है ।निम् की हवा हमारे आसपास की वातावरण को शुद्द करती है ।निम् की पत्ती सफेद दाग को स्वभाविक रंग में बदल देती है ।नीम का फूल आँखों के समस्त रोगों को ठीक कर देती है । इसके छाल फोड़े - फुंसी को सुखा देती है ।नीम कै , दस्त , हैजा , मलिरिया , पुराना ज्वर , गठिया , चरम रोग आदि रोगों की अचूक औषधि है ।यह बेजान में जान डाल देती है । नीम के लकड़ी के फर्नीचर बनवाये तो इसमें कभी भी घुन नही लगता । क्योंकि निम् के लकड़ी में प्रोटीन , कैल्शियम , विटामिन ए , एवं गन्धक प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । हम नीम के गुणों की बखान करते करते थक जाएंगे पर इसके गुणों की बखान पूरा नही हो पायेगी ।इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को निम् का सेवन प्रतिदिन किसी न किसी रूप में जरूर करनी चाहिये ।कम से कम नीम का दातुन प्रतिदिन जरूर करनी चाहिए ।

रविवार, 13 मार्च 2016

नीम पक्के बालो को काला करता है गंजेपन को दूर कर व्यक्ति को ओजस्वी बनाता है 

नीम पक्के बालो को काला करता है गंजेपन को दूर कर व्यक्ति को ओजस्वी बनाता है 


जो लोग नीम की छाया में बैठना नीम की दातुन करते है , निम् का तेल , पेस्ट , नीम का साबुन आदि का प्रयोग करते है पर प्रतिदिन नीम के कोपल का सेवन नही करते है वो सचमुच बड़ी गलती करते है ।यदि सचमुच निम् के कोपल को प्रतिदिन चबा ली जाय तो शरीर आजीवन रोगों से मुक्त रहेगा ।नीम प्रदूषण को नष्ट करता है । इस कारण नीम के प्रति दिन सेवन से व्यक्ति ओजस्वी बन जाते है । यह रक्त को साफ़ कर देता है ।इसके सेवन से पेट के कीड़े मर जाते है । जब बच्चों को चेचक निकलता है तो निम् के पत्ते से हवा देने पर तीन दिनों में ही चेचक सुख जाता है ।इस दृष्ट्री से निम् की हवा बहुत ही लाभदायक होता है ।

बालो को काला करता है :- कुछ युवको के बाल छोटी उम्र में ही बाल सफेद होने लगते है ।इसलिए उन्हें रोकने के लिए 100 ग्राम भांगरे के रस 50 ग्राम निबौली को भिगोदे । दो दिनों बाद निबौली को रस सहित घोट ले । इस तेल को दिन में तिन बार सुंधे ।इसे कुछ ही दिनों बाद बाल पकना बन्द हो जाएगा । साथ ही नीम के पत्ती को उबाल कर माथे को धोये । इसके एक दो माह के प्रयोग से बाल काले होने लगेंगे ।


गंजे हो जाने पर :- जब बाल धीरे - धीरे उड़ जाते है तो खोपड़ी गंजी हो जाती है ।इसे स्वंय में बड़ी झेप महसूस होती है । गंजेपन दूर करने के लिए नीम के तेल से सर को मालिश करनी चाहिए । बाल कुछ ही दिनों में उगना शुरू हो जाएगा । वैसे निम् का तेल कई बड़ी कम्पनिया बनाती है ।निम् के तेल को आप घर में भी तैयार कर सकते है ।नीम के तेल बनाने की विधि :- 200 ग्राम नीम के तेल में 50 ग्राम निम् के कोपल को पकाये जब तेल पक कर आधा हो जाये तो आग से उतारकर उसे छानकर शीशी में भर कर रख ले ।यह तेल प्रतिदिन 3 से चार माह लगाये उसके बाद खोपड़ी पर बाल उगना शुरू हो जाएगा ।नीम का तेल खोपड़ी पर खाद पानी का काम करता है ।

शनिवार, 12 मार्च 2016

नीम हमारे मुख पर कील मुहांसे को दूर कर हमारे सारे ज्ञान तंतुओ को खोल देती है ।

नीम हमारे मुख पर कील मुहांसे को दूर कर हमारे सारे ज्ञान तंतुओ को खोल देती है ।



            नीम का सीधा प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क और इन्द्रियों पर पड़ता है ।इसके सेवन से इंद्री सशक्त हो कर हमें एकाग्रता की ओर ले जाती है । इसका कड़ुआपन मिठास में परिवर्तित हो कर नाड़ियो को साफ़ कर इन्द्रियों को नई ऊर्जा प्रदान करता है ।निम् का सेवन करने से हमारे त्वचा के ऊपर वाले पनपने वाले विजातियो को काट कर हमारे त्वचा को उज्ज्वल बना देता है । यह अनेको प्रकार के बीमारियो को नष्ट कर हमारे आस पास बिमारी फैलने नही देता है ।


    मुख पर कील मुहांसे को दूर करने के लिए निम के प्रयोग विधि :- 


कील मुँहासे अधिकांशतः युवा अवस्था में रक्त के गर्मी के कारण होता है । जब कभी भी कील मुँहासे हो जाए तो इसे नोचना नही चाहिए । इसके लिए सुबह शाम एक चम्मच नीम के रस का सेवन करे इसे रक्त की गर्मी शांत हो जायेगी । और कील मुँहासे ऑख जायेंग एवं नए निकलने भी बन्द हो जायँगे ।

        दूसरी विधि - 10 ग्राम निम् के पती के रस , 10 ग्राम पठानी लोथ , 5 ग्राम अनार के छिलके को सुखाकर कूट पीस ले ।इसके बाद इसको नीम के तेल में मिलाकर किसी शीशी के जार में रख दे ।और जब कील मुहांसे हो तो इस तेल को कील पर लगाये ।कुछ दिनों बाद कील मुहांसे सुख जाएंगे और नए कील निकलना बन्द हो जाएंगे ।



शुक्रवार, 11 मार्च 2016

नाक के विविध रोगों के लिए नीम प्राकृति का चमत्कार है ।

नाक के विविध रोगों के लिए नीम प्राकृति का चमत्कार है ।


नाक के विविध रोगों के लिए निम् प्राकृति का चमत्कार है ।सच में नीम का पेड़ प्रकृति में एक चमत्कार है । हम चमत्कार को नमस्कार करते है । यदि ऐसा नही होता तो हम राम , कृष्ण , बुद्ध आदि की पूजा नही करते । नीम गुणों का पिटारा है । इसकी छाया , इसकी दातुन , इसकी पत्तिया , इसके फल फूल आदि सभी में रोगों को नाश करने की अपार शक्ति भरी है । प्रकृति ने वनस्पतियो में अपार शक्ति प्रदान की है पर निम् में जो शक्ति है वह किसी में नही है । नीम की पत्तिया को पानी में दाल कर औट ले और इस पानी से नहा ले ।आप देखेंगे की आपका महसूस करेंगे की आपका शरीर बहुत हल्का हो गया है ।आगर आपके त्वचा पर हल्ली फुलकी फुंसी हो तो खत्म हो जागेंगे ।स्त्रियां नीम के पानी से नित्य मुँह धोये निश्चित ही चेहरा गुलाब की तरह खिल जाएगा ।

नाक के विविध रोगों में नीम के प्रयोग की बिधि :- 


जुकाम में - जुकाम की बिमारी छोटे - बड़े किसी भी उम्र के व्यक्ति में आम है । इस रोग में 10 पत्ती नीम के , 5 काली मिर्च , 1 अदरख के गाँठ को पानी एक ग्लास पानी में औटें जब पानी आधी रह जाए तो इसे छान कर चाय की तरह पि ले ।3 से 4 खुराक में ही जुकाम ठीक हो जाएगा ।


नकसीर फूटना - गर्मी के दिनों में दिमाग में गर्मी का प्रभाव ज्यादा हो जाता है तो नाक से खून बहने लगता है ।जिसे हम नकसीर फूटना कहते है । जिसे वयक्ति घबड़ा जाता है ।इसके लिए निम्न प्रयोग करे ।


( 1 ) नीम के अंदर वाले छाल को पीस कर सर पर लेप करे खून आना बन्द हो जायेगा ।

( 2 ) नीम के कोपल को पीस कर कनपटी और माथे पर लेप करे नाक से खून आना बन्द हो जायेगा ।

(3 ) अक्सर गर्मी के दिनों में ही नाक से खून आता है इसलिए जी बच्चे को या व्यक्ति को नाक से खून आता है उन्हें नीम के पत्तियो का रस को चीनी के शर्बत के साथ पीना चाहिए जिसे दिमाग पर गर्मी का असर करेगा ही नही और नाक से खून आएगा ही नही ।

बुधवार, 9 मार्च 2016

नीम रोम -रोम को शीतलता प्रदान करने के साथ साथ आँखों के रोगों का अचूक औषधि है ।

नीम रोम -रोम को शीतलता प्रदान करने के साथ साथ आँखों के रोगों का अचूक औषधि है ।

नीम की सबसे बड़ी बिशेषता यह है की यह रोगो के गर्दन पर सीधी छुरी चलाती है ।आधा रोग तो नीम के नाम सुनते ही भाग जाता है ।जब हम उसके छाया में बैठ कर जो शीतलता महसुस करते है तो खाने के बाद कैसा अनुभव करेंगे ? जिन लोगो को निम् के नाम से मुँह कडुवा बनाया है उन्हें इसे एक बार खाकर जरूर देखना चाहिये ।यह भीतर से कडुआ नही मिथ होता है ।

आँखों के रोगों के उपचार के विधी :-

आँख दुखना - आँखो में धूल आदि चले जाने के कारण आँख आ जाती है आखे लाल हो जाती है आखो से पानी आने लगता है । कभी कभी सर्दी - गर्मी के प्रभाव से भ आखे दुखने लगते है । आयुर्वेद में इसके उपचार के लिए निम्न उपचार बताया गया है ।


(1) नीम के पत्ते को अच्छी तरह से साफ़ करके उसके एक से दो बून्द रस आँखों में टपकाना चाहिए इसे शरु में तो आहो में लगेगा पर कुछ ही क्षणों के बाद आँखों को ठंडक महसूस होगी ।

(2 )यदि बच्चों की आँख आ गई ही तो उसके कानो में एक से दो बून्द नीम के रस डाले ।यदि बायीं आँख दुःख रही हो तो बायीं तरफ के ही कान में रस डाले । इसे दो तीन दिनों में ही आखो की लाली कट जायेगी । आखो से पानी आना ठीक ही जाएगा ।

आँखों की जलन :- आँखों में जलन धुप , सर्दी ,सर में दर्द या अधिक ठन्डा पदार्थ खाने से हो जाता है । लगता है की आंखो में कोई मिर्च लगा दिया हो ।  आँख लाल हो गया हो । इस अवस्था में रोगी को मिर्च , खट्टा , ठंडे पदार्थ का सेवन नही करनी चाहिए ।

 प्रयोग विधि :-

( 1 ) नीम की पट्टी के रस में थोड़ी से पठानी लोध मिलाकर लेप बनाकर आँखों के पलको पर लगाये । इसे आँखों का जलन  एवं लाली शीघ्र  नष्ट हो जायेगी ।


रतौंधी रोग में :-कच्ची निबौली का दूध चांदी के सलाई से लगाये इसे रतौंधी कट जायेगी ।निम् के तेल भी आँख में लगाने से रतौंधी में काफी लाभ होता है ।


मोतियाबिंद में :- थोड़ी से निबौली को सुरमे की तरह पीस ले । फिर प्रतिदिन रात को सलाई के कांटी से आँख में अंजन की तरह  लगाये । इसे मोतियाबिंद की जाल कट जाएगा ।


आंखो से कम दिखाई देना :-विटामिन ए एवं विटामिन सी की कमी से आँखों की रौशनी कम हो जाती है ।इसके लिए भिजन में पर्याप्त मात्रा में टमाटर , पपीता ,  हरी सब्जी आदि लेनी चाहिए । निम् के सेवन से भी इस कमी को दूर की जा सकती है । नीम के दस ग्राम फूल में  पांच ग्राम कलमीशोरा लेकर उन्हें सुर्मा बनाले । फिर चांदी की सलाई से आँखों में सुबह शाम लगाये । इसे धीरे धीरे आंको की रौशनी आजायेगी ।





सोमवार, 7 मार्च 2016

नीम कान के रोगों का अचूक औषधि है ।

नीम कान के रोगों का अचूक औषधि है ।


नीम अमृत का दूसरा नाम है ।यह रोगों को सोख कर मनुष्य को दीर्घजीवी बनाता है ।नीम में अमृत के इतने गुण है की यह रोते को हंसा देती है और मरते को जीवित कर देती है ।यह वात - कफ साफ़ कर शरीर को निरोग कर देती है ।यह रक्त को धोती है । दाद खुजली का समूल नष्ट कर देती है ।पेट के कीड़े को मार देती है । नीम के पत्ते से अनाज में कीड़े नही लगते । कपड़े में इसके सूखे पत्ते रख दे तो कपड़े में कीड़े नही लगते ।इसमें इतने अधिक गुण भरे है की इसका बर्णन करना मुश्किल है । निम कमजोर को ताकतवर बना देता है । जो लोग सैकड़ो दवा खाकर निराश हो गए है वे लोग जरूर नीम के शरण में जाय ।यह निस्तेज को स्तेज बना देती है । आयुर्वेद में नीम एक ऐसी औषधि है जो सर्वगुण सम्पन्न है ।
 

 नीम द्वारा कान के रोगों के उपचार की विधि :-  


(1 ) कर्णशूल में :- इस रोग में कान में बहुत ही तेज दर्द होता है ।इसे दबाने से रोग और ही बढ़ जाता है । कच्ची निबौली की बिज को टिल के तेल में पक्का ले फिर इसमें फुलाया हुआ नीलाथोथा मिलाले इस तरह यह एक प्रकार से मल्हम सा हो जाएगा ।इस मल्हम को लगाने से कर्णशूल ठीक हो जाता है ।

( 2 ) कान के दर्द में - कान के अंदर मैल जम जाने के कारण , धूल चल जाने के कारण , कभी - कभी खुश्की के कारण कान में दर्द होने लगता है । इसके लिये नीम से बहुत ही कारगर उपचार किया जा सकता है ।
 प्रथम विधि - निम के पत्ता 25 ग्राम तथा नीलाथोथा ( तूतिया ) दोनों को पीस कर तील के तेल में गर्म कर ले उसके बाद कपड़े से तेल को छान कर शीशी में रख ले ।उसके बाद सलाई के कांटी में रुई भिगो कर कान में लगाये । या रात को कान साफ़ करके दो बून्द डाले ।इसे नींद भी अच्छी आएगी ।और दो से तिन दिन में कान का दर्द बिलकुल ठीक हो जाएगा ।
दूसरी विधि - नीम के निबौली को सरसो के तेल में डाल औंट ली ।ठंडा हो जाने के बाद कान में दो दो बून्द डाले । दर्द बहुत ही जल्द ठीक हो जायेगा ।



( 3 ) कान में कीड़े का प्रवेश - कान में यदि कीड़ा चला गया हो तो निम के पत्ती की रस को गुनगुना कर कान में दो बून्द डाले ।इसे कीड़ा मर जायेगा ।
बाद में इसे सलाई से कीड़े को निकाल दे ।



( 4 ) कान के बहने पर - कान प्रायः बच्चों के बहने लगते है । जब कभी बच्चों को दांत निकलता है , मौसम बदलता है सर्दी - गर्मी के प्रभाव से कान बहने लगता है । या कान में फुंसी निकल गया हो या कान में मवाद भर गया हो । तो सरसो के 100 ग्राम तेल में 20 से 30 निम् के पत्ति डाल कर आग पर धीमी आंच में पकाये उसके बाद उसमे पिसी हुई थोड़ी से हल्दी डाल कर कुछ देर रहने दे । जब तेल ठंडा हो जाय तो तेल को छान क्र शीशी में भर ले । इस तेल को प्रतिदिन कान को साफ़ कर कान में डाले ।इसे कान का बहना रुक जाएगा ।
   
दुसरी विधि - निम् के तेल में थोड़ी सी शहद मिला कर कान में लगाये ।इसे कान का बहना रुक जाएगा साथ ही दुर्गन्ध भी दूर हो जाएगा ।

 ( 6 ) कान का सुन्न पड जाना - कान प्राय उनक आवाज      ,बन्दूक या पटाखे के आवाज , अत्यधिक चिंता या नशा का सेवन जैसे शराब , अफीम स्मैक आदि से कान सुन्न हो जाते है । इसके लिए नीम के पत्ती के रस को कान में डाले ।और चार पांच पती चबाले ।इसे कुछ ही दिनों में कान का सुन्न पड़ना ठीक हो जायेगा ।

रविवार, 6 मार्च 2016

नपुसंकता को दूर करता है नीम

 


नपुसंकता को दूर करता है नीम  

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 नीम इतनी बढ़िया चीज है की इसका सीधा प्रभाव हमारे मन , मस्तिष्क और इन्द्रियों पर पड़ता है ।इसके सेवन से इन्द्रियाँ सशक्त होकर हमे एकाग्रता की और ले जाती है ।यदि स्वस्थ व्यक्ति भी इसका सेवन करता है उसे रोग दूर ही रहता है ।नीम का रेशा - रेशा हमारे शरीर में पहुच कर हमारे आंतो में घुस कर नाड़ियों को साफ़ कर देता है ।इस प्रकार नीम का कड़ुआपन मिठास में परिवर्तन होकर हमारे नाड़ियों को साफ कर देता है । नीम को खाने से त्वचा के सारे रोगों को दूर कर देता है ।यह बिलकुल सच है कि नीम अनेको प्रकार के रोगो को नष्ट कर देती है ।आस - पास भी बिमारी फैलने नही देती ।नीम के सेवन से इंद्री मजबूत हो जाती है ।नपुंसकता दूर हो जाती है साथ ही सेक्स पावर को बढ़ा देता है ।नपुंसकता आम रोग नही है इसलिय जब कभी नपुंसकता की आभास होतो निम् की सेवन जरूर करनी चाहिए ।

 


 नपुंसकता दूर करने की प्रयोग बिधि :-


 (1) दो चम्मच नीम के रस सुबह सेवन किया जाय तो नपुंसकता दूर हो जाती है साथ ही पौरुष बल बढ़ जाती है ।
(2) नपुंसकता विरोधी तेल से भी रोगी को बहुत फायदा होता है । बनाने की आसान विधि - 100 ग्राम नीम के छाल , 100 ग्राम बेल के छाल , नगरमोथा 100 ग्राम , त्रिफला 100 ग्राम ' आँवला 2 किलो , गिलोय 2 किलो सब को कूट पीस कर तील के 500 ग्राम तेल में पकाये ।जब आधा रह जाए तो इसे आग से उतार कर ठंडा कर कपड़ा से छान कर बोतल में भर ले । सुबह शाम इस तेल से इंद्री को मालिश करे । 10 से 15 दिनों में ही लिंग में कड़ापन आने लगेगा । इस तेल को लगाने के बाद पानी से न धोये ।

शनिवार, 5 मार्च 2016

कान के रोगों का अचूक औषधि - नीम



नीम कान के रोगों का अचूक औषधि है । 


नीम अमृत का दूसरा नाम है ।यह रोगों को सोख कर मनुष्य को दीर्घजीवी बनाता है ।नीम में अमृत के इतने गुण है की यह रोते को हंसा देती है और मरते को जीवित कर देती है ।यह वात - कफ साफ़ कर शरीर को निरोग कर देती है ।यह रक्त को धोती है । दाद खुजली का समूल नष्ट कर देती है ।पेट के कीड़े को मार देती है । नीम के पत्ते से अनाज में कीड़े नही लगते । कपड़े में इसके सूखे पत्ते रख दे तो कपड़े में कीड़े नही लगते ।इसमें इतने अधिक गुण भरे है की इसका बर्णन करना मुश्किल है । निम कमजोर को ताकतवर बना देता है । जो लोग सैकड़ो दवा खाकर निराश हो गए है वे लोग जरूर नीम के शरण में जाय ।यह निस्तेज को स्तेज बना देती है । आयुर्वेद में नीम एक ऐसी औषधि है जो सर्वगुण सम्पन्न है ।

 नीम द्वारा कान के रोगों के उपचार की विधि :-


 (1 ) कर्णशूल में :- इस रोग में कान में बहुत ही तेज दर्द होता है ।इसे दबाने से रोग और ही बढ़ जाता है । कच्ची निबौली की बिज को टिल के तेल में पक्का ले फिर इसमें फुलाया हुआ नीलाथोथा मिलाले इस तरह यह एक प्रकार से मल्हम सा हो जाएगा ।इस मल्हम को लगाने से कर्णशूल ठीक हो जाता है । 

( 2 ) कान के दर्द में -कान के अंदर मैल जम जाने के कारण , धूल चल जाने के कारण , कभी - कभी खुश्की के कारण कान में दर्द होने लगता है । इसके लिये नीम से बहुत ही कारगर उपचार किया जा सकता है । 

 प्रथम विधि - निम के पत्ता 25 ग्राम तथा नीलाथोथा ( तूतिया ) दोनों को पीस कर टिल के तेल में गर्म कर ले उसके बाद कपड़े से तेल को छान कर शीशी में रख ले ।उसके बाद सलाई के कांटी में रुई भिगो कर कान में लगाये । या रात को कान साफ़ करके दो बून्द डाले ।इसे नींद भी अच्छी आएगी ।और दो से तिन दिन में कान का दर्द बिलकुल ठीक हो जाएगा । 

दूसरी विधि - नीम के निबौली को सरसो के तेल में डाल औंट ली ।ठंडा हो जाने के बाद कान में दो दो बून्द डाले । दर्द बहुत ही जल्द ठीक हो जायेगा ।


 ( 3 ) कान में कीड़े का प्रवेश - कान में यदि कीड़ा चला गया हो तो निम के पत्ती की रस को गुनगुना कर कान में दो बून्द डाले ।इसे कीड़ा मर जायेगा । बाद में इसे सलाई से कीड़े को निकाल दे । 


 ( 4 ) कान के बहने पर -कान प्रायः बच्चों के बहने लगते है । जब कभी बच्चों को दांत निकलता है , मौसम बदलता है सर्दी - गर्मी के प्रभाव से कान बहने लगता है । या कान में फुंसी निकल गया हो या कान में मवाद भर गया हो । तो सरसो के 100 ग्राम तेल में 20 से 30 निम् के पत्ति डाल कर आग पर धीमी आंच में पकाये उसके बाद उसमे पिसी हुई थोड़ी से हल्दी डाल कर कुछ देर रहने दे । जब तेल ठंडा हो जाय तो तेल को छान क्र शीशी में भर ले । इस तेल को प्रतिदिन कान को साफ़ कर कान में डाले ।इसे कान का बहना रुक जाएगा । दुसरी विधि - निम् के तेल में थोड़ी सी शहद मिला कर कान में लगाये ।इसे कान का बहना रुक जाएगा साथ ही दुर्गन्ध भी दूर हो जाएगा ।

 ( 5 ) कान का सुन्न पड जाना -कान प्राय उच्ची आवाज , बन्दूक या पटाखे के आवाज , अत्यधिक चिंता या नशा का सेवन जैसे शराब , अफीम स्मैक आदि से कान सुन्न हो जाते है । इसके लिए नीम के पत्ती के रस को कान में डाले ।और चार पांच पती चबाले ।इसे कुछ ही दिनों में कान का सुन्न पड़ना ठीक हो जायेगा ।

गुरुवार, 3 मार्च 2016

नीम् के गुण -नीम धरती का अमृत है ।


नीम के गुण , नीम एक इसके फायदे अनेक है ।



यह रोगों का दुश्मन है । इसके महत्व का जीतना वर्णन किया जाय कम ही है ।नीम का पेड़ पुरे भारत में पाया जाता है । नीम के पेड़ को प्रकृति ने आधा बैध बनाया है ।यह ठण्डी है और गर्म भी ।इसके खाने से वयक्ति का शरीर कंचन सा हो जाता है ।इसके सेवन करने वाले से रोग दूर रहता है ।निम खाने में कड़वा पर गुणों में मीठा होता है ।वैसे भी देखा गया है की जो लोग कड़वे बोलते है उनमे से अधिकाँश लोग अंदर से परोपकारी , दयालु , निःस्वार्थी और दिल के सच्चे होते है ।निम के पेड़ के साथ भी कुछ ऐसा ही है । नीम को संस्कृत में निम्ब कहते है यानी की ' निम्बति - स्वास्थ्यं ददाति ' जो शरीर को निरोग कर दे वह निम्ब है । नीम के अनेको फायदे है ।इनका प्रयोग बिमारी के लक्ष्णों के अनुसार किया जाता है । निम के जड़ ' पत्ते , टहनी , फले , इसके छाल ये सारे मानव के रोगों को दूर करने के काम में आते है । नीम के दातुन दांतो के प्रत्येक रोगों को नष्ट कर देती है ।जो लोग नियमित नीम के दातुन का प्रयोग करते है उनके पास किसी भी प्रकार के दांतो का रोग भटक ही नही सकता । इसके पत्तियां और निबौलिया शरीर में रक्त को शुद्द करके खून को ताजा बनाती है ।इसके फूल आँखों को ठंडक पहुचाती है ।इसके छाल घाव को सोख लेती है ।जिन लोगो के पास महंगे इलाज कराने में सक्षम नही उन्हें नीम का इलाज जरूर करना चाहिए । इसी कारण से अनेक बिद्वानो ने निम् को गरीबो का आँख बताया है ।नीम का प्रयोग शरीर को ठंडक प्रदान करता है , ताजा बनाता हैं , शरीर को सुगन्ध और सौंदर्य से भर देता है ।निम का अर्थ ही है कि आँखों को ठंडक पहुचाओ ।ईश्वर ने नीम में हजारो गुण प्रदान किये है ।इसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम हैं ।

मंगलवार, 1 मार्च 2016

गोखरू ( small caltrap ) , नामर्दी , पथरी , हिर्दय रोग , खांसी , रक्त - पित को नष्ट कर देता है ।



गोखरू ( small caltrap ) नामर्दी , पथरी , हिर्दय रोग , खांसी , रक्त - पित को नष्ट कर देता है ।

यह पूरे भारत में पाया जाता है ।गोखरू ऊसर जमीन पर अपने आप उगने वाला पौधा है ।गोखरू को संस्कृत में - गोक्षुर , हिंदी में - गोखरू , मराठी में - सराठे , तेलगु में - पात्तेरुमुल्लु , तमिल में - नेरनजी , लैटिन में - ट्रिबुल्स टेरेस्ट्रिस कहते है । गोखरू के पौधे चने के पौधे की तरह दीखता है । इसकी टहनी और तना सफेद रोमो से युक्त होता है ।इसकी जड़े 5-6 इंच लम्बे , इसकी पत्तिया 3 इंच तक लम्बी होती है ।इसके फूल जादी में होती है जो पांच पंखुड़ी वाली हल्के पिले रंग के होते है ।जिसमे छोटे छोटे कांटे होते है ।गोखरू के फल में पांच कोष्ठ होते है इसमें अनेक बिज होते है । गोखरू स्वाद में मीठा , भारी , अनुमोलन , रसायनिक और शीतल होता है । यह बलबर्द्धक , वाट - पितनाशक , और आमाशय को बल देने वाला होता है । यह प्रमेह , नामर्दी , पथरी , दाह , ह्रदय - रोग , आदि को नष्ट कर देता है ।

 इसके प्रमुख लाभ :- 


 ( 1 ) गोखरू के 3 से 4 ग्राम चूर्ण को शहद में मिलाकर सुबह शाम चाटे और ऊपर से एक छोटी ग्लास भेड़ के दूध पीले । इस तरह सात आठ दिनों में पथरी गल कर निकल जायेगी । दूसरी विधि एक लीटर पानी में 50 ग्राम गोखरू को मोटा कूट कर उबाले जब आधा रह जाए टी इसमें 50 ग्राम मिश्री और 10 ग्राम यवक्षार की मिला कर उसका कुल चार मात्रा बनाले और उसे सुबह दोपहर शाम और रात को दे ।इस तरह कुछ दिनों के प्रयोग से पथरी गल कर निकल जायेगी ।

 ( 2 )सुजाक के जलन में :- गोखरू के हरे पत्ते 10 ग्राम , ककड़ी के बिज 6 ग्राम और काली मिर्च 2 ग्राम इन सब को घोट कर पिने से सुजाक के कारण होने वाली जलन ठीक हो जाती है ।

( 3 ) स्वप्नदोष में :- 50 ग्राम गोखरू के फल को सुखा ले ।फिर 50 ग्राम मिश्री के साथ पीस कर सुबह शसम 3 से 4 ग्राम की मात्र में ले ।स्वप्नदोष ठीक ही जाएगा ।    
( 4 ) पुरुषो में सेक्स पावर को बढ़ाने एवं बल वीर्य - बृद्धि के लिए - (a) 50 ग्राम गोखरू के चूर्ण , 50 ग्राम शनतावर के चूर्ण को कूट कर 250 मिली दूध और 250 ग्राम पानी में उबाले जब जल कर आधी हो जाए तो उसे आग से उतारकर कपड़े से छान कर शहद या मिश्री के साथ पीयें ।एक से डेढ़ माह में मर्दानी ताकत और बल बीर्य में बृद्धि हो जायेगी ।

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

मधुमेह (चीनी ) की बिमारी में गूलर ( cluster fig ) बहुत ही लाभदायक होता है ।


मधुमेह (चीनी ) की बिमारी में गूलर ( cluster fig ) बहुत ही लाभदायक होता है । गूलर ( clusrer fig ) के गुण गूलर के सेवन से मधुमेह , फोड़ा , अतिसार , खांसी जुकाम , स्त्रियों में रक्त प्रदर दूर हो जाते है साथ ही इसे पुरुषो में मर्दानी ताकत एवं वीर्य बृद्धि भी होती है ।


 गूलर के पेड़ प्राय पुरे भारत में पाये जाते है ।इसके पेड़ लगभग 30 से 50 फुट ऊँचे होते है । इसमें फूल नही आते । इसलिए इसे अपुष्पा भी कहते है ।इसमें गुच्छो के रूप में फल आते है , जो शुरू में हरे होते है पकक जाने पर लाल हो जाते है ।इसके तने को गोदने से दूध निकलता है जी कुछ ही क्षणों में पीला पड जाता है । इसे बिभिन्न भाषाओ में अलग अलग नामो से जाना जाता है । संस्कृत में - उदुम्बर , अपुष्पा ।हिंदी में - काकमाल , गूलर । मराठी में - उम्बर ।तमिल में - खारसा । बतेलगु में - राइगा। बंगाली में - यज्ञ - डुम्बुर । यह शीतल , कसैला , मधुर , कफ पित्तनाशक , सूजन वेदना , दाह , अर्श , मधुमेह , रक्त - पित्त , रक्त - प्रदर , प्रमेह , का नाश करने वाला होता है ।साथ ही स्तम्भक , गर्भाशय -शोधनाशक , घाव , रक्तदोष मिटाकर रंग निखारने वाला होता है ।

 लाभ एवं प्रयोग विधि :-

 ( 1 ) मधुमेह में :-  200 ग्राम गूलर के पक्के हुए फल , 200 ग्राम गूलर के कच्चे फल , एवं 200 ग्राम जामुन की गुठली , इन सब को सुखाकर कूटकर चूर्ण बनाले । प्रतिदिन 10 ग्राम की मात्रा में 2 या तिन बार ठंडे पानी से ले । इसे खून में चीनी की मात्रा बढ़ नही पाती और धीरे - धीरे चीनी कम होती जाती है । 

 ( 2 ) मर्दानी ताकत एवं वीर्य -बृद्धि में : - 50 ग्राम गूलर के पक्के हुए फल , 50 ग्राम विदारीकन्द इन दोनों को कूट कर चूर्ण बनाले ।सुबह शाम 4 से 5 ग्राम की मात्रा में एक ग्लास दूध में एक छोटी चम्मच शुद्ध देशी घी के साथ मिलाकर पीले ।इसके सेवन से कुछ ही दिनों में बल वीर्य बढ़ जाता है ।ध्यान रहे जिसका पाचन शक्ति कमजोर हो वे इसका सेवन न करे । दूसरी विधि :- बताशे में गूलर का दुध भर कर सुबह - शाम खाले इसे 15 से 20 दिनों में अपार ताकत एवं बल- वीर्य बढ़ जाती है । प्रयोग काल में यथा संभव सम्भोग से बचे ।

( 3 ) स्त्रियों के रक्त -प्रदर में :- गूलर की ताज़ी छाल 10 ग्राम को मोटा कूट कर उसे 125 ग्राम पानी में उबाले , जब एक चौथाई रह जाय तो उसे आग से उतारकर छान ले और उसमे पीसा हुआ सफेद जिरा 1 ग्राम एवं 10 ग्राम मिश्री मिलाकर पि ले ।इस तरह सुबह शाम लेने से रक्त प्रदर ठीक हो जाता है ।

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

हिस्टीरिया , पागलपन , मिरगी एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाने में शंखपुष्पी एक अचूक औषधि है ।


हिस्टीरिया , पागलपन , मिरगी एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाने में शंखपुष्पी एक अचूक औषधि है ।

शंखपुष्पी सामान्य रूप से पथरीली , रेतीली , एवं सख्त जमीन पर होती है । यह पुरे भारत में सड़को के किनारे बगीचो आदि में देखने को मिल जाती है । यह सालो भर पाई जाने वाली औषधि है । इसे संस्कृत में- क्षीरपुष्पी , हिंदी में - शंखपुष्पी , मराठी में - साखखेल , बंगाली में - डानकुणी , गजराती में - शंखावली , लैटिन में - कनवालबुल्स , प्लुरिकॉलिन्स आदि नामो से जाना जाता है । शंखपुष्पी के पौधा लगभग 4 से 5 इंच ऊँचा होता है ।इसकी छोटी छोटी शखाये जमीन पर फैली होती है ।इसके पत्ते बिना डंठल के हल्की सी सफेद आभा लिए हुए जामुनी रंग होते है ।इसके पत्ते पर मुलायम रोम होते है । इसके फूल सफेद , नील या हल्का गुलाबी रंग के शंख के अकार के होता है ।इसलिये इसे शंखपुष्पी कहते है ।इसके फूल में पांच पात्र होते है ।इसके फल लम्बे , चिकने , और भूरे रंग के होते है ।जिसके अंदर भूरे या काले रंग के बिज होते है ।शंखपुष्पी तीन प्रकार के होते है नीले फूल वाली , लाल फूल वाली , एवं सफेद फूल वाले ।इनमे सफेद फूल वाली ही लाभप्रद एवं उपयोगी होता है ।हमेशा सफेद फूल वाली ही शंखपुष्पी वाले पौधे का ही औषधि के रूप में प्रयोग करनी चाहिए । यह कषाय , कटु , चिकनी , शांतिप्रदायक , मधुरबिपाकि, वात- पित को शांत करने वाली एवं दाहनाशक है । यह मष्तिष्क रोगों के लिए बड़े ही लाभकारी होता है ।यह स्नायु को बल देने वाली , ह्रदय को ताकत देने वाली , स्वर को ठीक करने वाली एवं रक्त को शुद्धि करने वाली है ।इसके सेवन से स्मरण शक्ति बढ़ती है । इसका प्रयोग किसी भी उम्र के व्यक्ति कर सकते है ।

 शंखपुष्पी के प्रमुख फायदे :-


 ( 1 ) हिस्टीरिया में - हिस्टीरिया के रोग में यह संजीवनी का काम करता है । मुलहटी 5 ग्राम शनतावर 5 ग्राम वच 2 ग्राम एवं शंखपुष्पी 5 ग्राम । इन सब को कूट पीस कर चूर्ण बनाले ।एवं इसके चार मात्रा बनाले ।सुबह शाम एक एक मात्रा दूध के साथ ले ।इस प्रकार कुछ ही दिनों में हिस्टीरिया रोग ठीक हो जाता है ।पागलपन के लक्ष्णों में भी आराम मिलता है ।इसे स्त्रियों के गर्भाश्य की दुर्बलता भी दूर होती है ।


 ( 2 ) पागलपन में - 20 से 25 बून्द शंखपुष्पी के रस को पिने से पागलपन , मिरगि , चिट में व्यकुलता आदि बहुत जल्द ठीक हो जाता है ।इस रस से पेट भी साफ़ हो जाता है ।


 ( 3 ) स्मरण शक्ति बढ़ाने में :-शंखपुष्पी के पत्ता , फल , फूल , बिज एवं जड़ इन सबको मिलाकर धुप में सुखा कर कूट ले एवं कपड़े से छान कर 4 से 5 ग्राम चूर्ण दूध या ठंडे पानी के साथ सुबह शाम ले ।इसे दिमाग को ताकत मिलता है और स्मरण शक्ति बढ़ती है ।बच्चों को आधी मात्रा में देनी चाहिए ।

द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) Leueus aspera साँप के काटने पर जहर को बेअसर करने का एक असरदार औषधि है ।


द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) Leueus aspera साँप के काटने पर जहर को बेअसर करने का एक असरदार औषधि है ।


 द्रोणपुष्पी जिसे हम गुम्मा के नाम से भी जानते है ।यह पुरे भारत में पाया जाता है । यह विशेष कर ईंख के खेतो में मिल जाता है ।हिमालय के पहाड़ो पर बहुतायत मात्रा में मिलता है । इसे हिंदी में - गुम्मा , दणहली । मराठी में - तुंबा ।संस्कृत में द्रोणपुष्पी । तमिल में - तुम्बरी ।तेलगु में - मयपातोसि ।बंगाली में - हलक्स , पलधया ।गुजराती में -कुबो आदि नस्मो से जाना जाता है । द्रोणपुष्पी के पौधा दो से चार फुट लम्बा एवं चार - पांच शाखाओं वाली गुम्बजकार होता है । द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) के पौधे पर सफेद रंग के छोटे छोटे रोयें होते है ।इसके पत्ते 2-3इंच लम्बे रोयेदार एवं दांतेदार किनारे वाले होते है ।इसके फूल प्याले जैसे आकृति के सफेद और गुच्छेदार होते है ।फूल के प्रत्येक गुच्छे पर दो पत्तियां लगी रहती है ।इसके जड़ पतली एवं 5 से 6 इंच लम्बे होते है । जिसकी गन्ध तेज होती है । इसका प्रयोग से अनेको रोग दूर हो जाते हैं ।यह उदर - रोग , बिष दोष , यकृत विकार , पक्षाघात आदि में बहुत ही लाभप्रद औषधि है ।

 प्रमुख लाभ -



 ( 1) विषम -ज्वर - गुम्मा या द्रोणपुष्पी के टहनी या पट्टी को पीस कर पुटली बनाले और उसे बाए हाथ के नाड़ी पर कपड़ा के सहयोग से बाँध दे । इसे रोगी का ज्वर बहुत ही जल्द ठीक हो जाता है ।

 ( 2 ) सुखा रोग में - सुखा रोग ख़ास कर छोटे बच्चों को होता है । गुम्मा के टहनी या पत्ते को पिस कर शुद्ध घी में आग पर पक्का ले और ठंडा होने के बाद इस घी से बच्चे के शरीर पर मालिश करे ।इस सुखा रोग बहुत ही जल्द दूर हो जाता है ।

 ( 3 ) साँप के काटने पर :- किसी भी व्यक्ति को कितना भी जहरीला साँप क्यों न काटा हो उसे द्रोणपुष्पी के पत्ते या टहनी को खिलाना चाहिए या इसके 10 से 15 बून्द रस पिला देना चाहिए ।अगर वयक्ति बेहोश हो गया हो तो गुम्मा (द्रोणपुष्पी ) के रस निकाल कर उसके कान , मुँह और नाक के रास्ते टपका दे ।इसे व्यक्ति अगर मरा नही हो तो निश्चित ही ठीक हो जाएगा ।ठीक होने के बाद उसे कुछ घण्टे तक सोन न दे ।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

गिलोय (heart leaves ) के गुण - गिलोय ज्वर , प्रमेह , स्वेत प्रदर , सुजाक , बावासीर , बल वीर्य बृद्धि एवं रोगों के बाद शारीरिक कमजोरी को दूर करने का कारगर औषधि है ।



गिलोय (heart leaves ) के गुण - गिलोय ज्वर , प्रमेह , स्वेत प्रदर , सुजाक , बावासीर , बल वीर्य बृद्धि एवं रोगों के बाद शारीरिक कमजोरी को दूर करने की कारगर औषधि है । 


गिलोय का पौधा पुरे भारत में पाया जाता है ।इसे लोग अपने बाग़ बगीचो में भी लगाते है । यह बहुत ही गुणकारी पौधा है । गिलोय के तने पर घूसर रंग के पतली सी छाल होती है जिसे छिलने पर हरा रंग दिखाई देता है । इस पर छोटी छोटी गाँठ होती है ।इसके पत्ते चिकने दिल के अकार के 3 से 4 इंच लम्बे एवं चौडा होता है । गर्मी के दिनों में इसमें गुच्छो के रूप में पिले फूल आते है ।इसके फल भी गुच्छो के रूप में आते है जो कच्चे होने पर हरा एवं पकने पर लाल होता है । इसके फल के अंदर मिर्चा के बिज की तरह सफेद बिज होता है ।गिलोय बेल के रूप में लगता है जो पेड़ो और पहाड़ो के सहारा लिलार बढ़ता है । अगर यह निम् के पेड़ पर चढ़ जाय तो इसे निम् गिलोय कहते है जो ज्यादा गुणकारी होता है ।

     यह ज्वर , वमन , यकृत रोग , प्रमेह , पीलिया , रोग के बाद आई कमजोरी , कृमि , चर्म रोग आदि का नाश करती है ।गिलोय ह्रदय को बलदायक , कफ नाशक , रक्त शोधक , वीर्यवर्द्धक , तनावनाशक एवं पौष्टिक होता है ।


 गिलोय  के अनेको फायदे है जो इस प्रकार है । गिलोय के फायदे :- 



 ( 1 ) ज्वर में :- 5 ग्राम गिलोय , 4 ग्राम अजवायन , छोटी पीपल 2 नग , काली मिर्च 5 नग इन सब को मिलाकर पानी में उबाल ले एयर फिर इसे छान कर गुनगुने मरीज को दे इसे ज्वर में बहुत ही लाभ होता है ।

 (2)बिषम ज्वर में :- गिलोय के ताजा रस 8 से 10 ग्राम प्रतिदिन 2 से 3 बार दे ।इसे बिषम ज्वर भी ठीक हो जाता है ।

 ( 3 ) प्रमेह में : - गिलोह का रस 10 ग्राम शहद के साथ कुछ दिनों तक ले इसे प्रमेह नष्ट हो जाता है ।

 ( 4 ) प्रदर में :- अशोक के छाल के काढ़े के साथ गिलोय के सत्व 1 ग्राम रोजाना 3 बार दे ।इस प्रकार से कुछ दिनों तक लगातार लेने से स्वेत प्रदर और रक्त प्रदर दोनों ही दूर हो जाते है ।

 ( 5 ) सुजाक में :- गिलोय के काढ़े को दूध में मिलाकर पिने से कुछ ही दिनों में सुजाक नष्ट हो जाता हैं ।

 ( 6 ) यौन ताकत और वीर्य- बृद्दी के लिये :- 5 ग्राम लौहभस्म , 5 ग्राम बंगभस्म, 5 ग्राम अभ्रक भस्म , 5 ग्राम छोटी पीपल , 5 ग्राम छोटी इलाइची , एवं 10 ग्राम गिलोय का सत्व , इन सब को मिलाकर रखले और रोजाना सुबह शाम आधा ग्राम शहद के साथ चटनी की तरह चाट ले ।और ऊपर से एक ग्लास गुनगुने दूध पीले। इसे शारीरिक थकान , नपुंसकता , निर्बलता , और कमजोरी मीट जाती है ।

 (7) बावासीर में :- 1 ग्राम बंशलोचन , 10 ग्राम मिश्री , 5 पीस छोटी इलाइची , और 6 ग्राम निमगिलोय । इन सबको पीसकर 10 मात्रा बनाले और रोजाना एक मायरा खाये ।दस दिनों में हर प्रकार के बवासीर ठीक हो जाएगा ।

 ( 8 ) रोग के बाद कमजोरी में :- शितोपलादि चूर्ण 50 ग्राम , प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम , गिलोय सत्व 30 ग्राम , इन सब को मिलाकर पीसकर रखले और दो दो चम्मच सुबह शाम शहद के साथ चाटे और ऊपर से एक ग्लास गुनगुने दूध ले । एक से दो माह में ही निर्बलता मिट जायेगी और नई जीवन शक्ति आजायेगी ।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

कब्ज , पेचिश , वायु- विकार , स्तन -रोग , यौनांगों में दर्द , जोड़ो में दर्द आदि में अरण्डी ( एरण्ड ) castor का तेल बहुत ही कारगर औषधि है ।


कब्ज , पेचिश , वायु- विकार , स्तन -रोग , यौनांगों में दर्द , जोड़ो में दर्द आदि में अरण्डी ( एरण्ड ) castor का तेल बहुत ही कारगर औषधि है ।


 अरण्डी पुरे भारत में पाया जाता है ।समशीतोष्ण और उष्ण कटिबन्ध जलवायु वाले स्थान पर विशेष रूप से मिलता है । इसे भिन्न भिन्न भाषाओ में अलग अलग नामो से जाना जाता है ।संस्कृत में - एरण्ड , पंचगुल । हिंदी में - अरण्डी , अंडी , रेंडी । मराठी में - धोली एरण्डो । बंगाली - भरेंडा आदि नामो से जाना जाता है । अरण्डी के पेड़ लगभग 10 से 15 फुट ऊँची होती है । इसके पत्ते गोल , 6 से 7 भागो में बीते हुये तथा स्वेताभ् हरे होते है ।इस पर केसरी - पिले या लाल - बैगनी फूल आते है ।इसके फल कंटीले , हरे गुच्छो में और कठोर परत वाले तिन बीजो से युक्त होते है ।यह लाल और सफेद दो प्रकार के होता है ।

अरण्डी के गुण :- यह कृमि नाशक , कफ नाशक , वीर्यवर्द्धक , गर्भाशय शुद्दिकर्ता कब्ज , बावासीर , भगन्दर आदि अनेको रोग में इसका तेल बहुत ही उपयोगी होता है । 

 ( 1 ) कब्ज -एक ग्लास दूध में एक चम्मच अरण्डी के तेल मिलाकर रात को सोने से पहले पिले ।इसे सुबह खुल कर मल्ल त्याग होगा । जरूरत पड़े तो इसे तीन - चार दिन ले । 

 ( 2 ) पेचिश :-खुनी और आंव दोनों तरह के पेचिश में एरण्ड का तेल 2 से 3 छोटे चम्मच ले ।इसे पेचिश में आराम मिलता है । 

 ( 3 ) वायु - विकार : -सोंठ 5 ग्राम , एरण्ड की जड़ 10 ग्राम इन दिनो को मोटा कूट कर और 200 ग्राम पानी में उबाले जब एक चौथाई रह जाए तो तो इसमें थोड़ी सी गुड़ मिलाकर पिये ।कुछ दिनों तक प्रतिदिन 2 बार ले ।इस प्रयोग से कमर दर्द , सर्वांग वात- वेदना , आमवात , उदरवात आदि में बहुत ही लाभ होता है । 

 ( 4 ) जोड़ो में दर्द :- कहीँ के भी जोड़ो के दर्द में अरण्डी ( रेंडी ) के पत्ता पर सर्सो के तेल लगाकर आग पर गर्म कर कपड़ा से जहां दर्द हो वहा बाँध दे ।कुछ दिनों के प्रयोग से जोड़ो का दर्द ठीक हो जाता है । 

 ( 5 ) स्तन - रोग :-यदि स्तन की घुंडी फट गई हो तो उसपर अरण्डी का तेल लगाये । दो से चार दिनों में ठीक हो जाएगा । स्तन में सूजन हो गया हो तो उस पर अरण्डी के पत्ते पर अरण्डी के ही तेल लगाकर बंका गर्म करकर अच्छी तरह से कपड़े के सहयोग से बाँध दे । इसे स्तन के सूजन में बहुत ही लाभ होता है ।

( 6 ) यौनांग में दर्द - स्त्रियों के यौनांग में दर्द हो तो अरण्डी के तेल को रुई में भिगोकर यौनांग के अंदर कुछ देर तक रखे । इसे यौनांग के दर्द दूर हो जाता है ।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

ईसबगोल ( spogel seeds ) के सेवन से कब्ज , अतिसार (दस्त) बवासीर , अनैच्छिक वीर्यपतन , स्त्रियों में रक्तस्राव आदि अनेको रोग दूर हो जाते है ।


ईसबगोल ( spogel seeds ) के सेवन से कब्ज , अतिसार (दस्त) बवासीर , अनैच्छिक वीर्यपतन , स्त्रियों में रक्तस्राव आदि अनेको रोग दूर हो जाते है ।

ईसबगोल प्रायः उष्ण - कटिबन्धीय स्थानो में पाया जाता है । यह भारत में पंजाब , मैसूर , बंगाल एवं भारत के उत्तर - पश्चिम क्षेत्र में बहुतायत मात्र में पाया जाता है । इसे संस्कृत में - अश्वकर्णबीज , वश्वगल ।बंगाली में - इसबगुल , गुजराती में - ऊधमी जीरु । हिंदी में - ईसबगोल एवं लैटिन में प्लैन्टेगो ओवेटा कहते है । इसका पौधा डंठल रहित , छोटा रोमयुक्त तथा 2 से 3 फुट लम्बा होता है ।इसकी पत्तियां लगभग आधा इंच चौड़ा एवं 4 से 6 इंच तक लम्बा होता है । इसकी टहनियों से गेहूं के बाल की बाली जैसी फूलो की लम्बी फर निकलते है ।इसके फलो की मंजरियाँ गुच्छेदार होती है और इसमें झिल्लियुक्त , चिकने , पिलाभ भूरे बिज होते है । इन बीजो को कूटकर इसके ऊपर के झिल्ली से अलग कर ईसबगोल की भूसी तैयार की जाती है । ईसबगोल की भूसी के अनेको फायदे है ।यह ग्राही , मूत्रल , शीतलता , वायु - कारक , कब्ज नाशक , मधुर एवं पौष्टिक होता है ।यह दाह , कब्ज , आंत रोगों तथा घाव आदि रोगों का नाशक होता है ।आमाशय और आंतो को बल देता है । शरीर में शीतलता प्रदान करता है । पर इसका ज्यादा दिनों तक सेवन से शरीर में दर्द मासपेशियों में दुर्बलता आदि विकार पैदा होती है । इसलिये इसका ज्यादा दिनों तक सेवन नही करनी चाहिए ।

 ईसबगोल के प्रमुख फायदे - 


 ( 1 ) कब्ज में -दो चम्मच ईसबगोल की भूसी रात को सोने से एक घन्टा पूर्व एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ ले ।इसे सुबह पेट की साड़ी कब्ज साफ़ हो जायेगी । अगर पुरानी कब्ज हो तो 4 से 5 दिनों तक सेवन करनी चाहिए ।इसे पुरानी से पुरानी कब्ज ठीक हो जाता है । दूसरी विधि :- एक छोटी ग्लास दूध में दो छोटी चम्मच ईसबगोल की भूसी में लगभग 5 मिली . अरण्डी के तेल मिलाकर रोगी को रात को पिलादे इसे अगली सुबह पेट साफ़ हो जाता है ।जरूरत हो तो 3 से 4 दिनो तक देनी चाहिए । 


 ( 2 ) दस्त ( अतिसार ) :- ठंडा पानी या मट्ठा के साथ पांच से छः ग्राम ईसबगोल के भूसी को लेने से दस्त में आराम मिलता है ।इस प्रकार इसे 2 से 3 दिन के प्रयोग करनी चाहिए । 


 ( 3 ) बवासीर में :- लगभग 200 ml मट्ठा के साथ एक बड़ी चम्मच ईसबगोल की भूसी प्रतिदिन 3 बार ले ।इसका एक महीनो तक सेवन से हर प्रकार का बवासिर ( खुनी या वादी ) समाप्त होजाता है । 


 ( 4 )अनैच्छिक वीर्यपात :- दिन में दो बार दो चम्मच ईसबगोल की भूसी शिंदे पानी से ले इसे अनैच्छिक वीर्यपतन की शिकायत दूर हो जाती है । 


 (5) स्त्रियों में रक्तस्राव :- मट्ठे के या ठंडा पानी के साथ दो चम्मच ईसबगोल की भूसी से स्त्रियों में रक्त प्रदर , मूत्राशय से खून आना धीरे धीरे समाप्त हो जाता है । इसे प्रतिदिन सुबह शाम ले ।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

बवासीर , कफ - विकार , गाँठ -सूजन , मासिक विकार का अचूक औषधि है अमलतास ( Pudding pipe tree )


बवासीर , कफ - विकार , गाँठ -सूजन , मासिक विकार का अचूक औषधि है अमलतास ( Pudding pipe tree ) अमलतास के पेड़ के सारे भाग औषधि के काम आता है ।आयुर्वेद में इसका विस्तृत वर्णन है ।


अमलतास का पेड़ भारत के सभी भागो में पाया जाता है ।यह स्वयं से उगने वाला वृक्ष है पर अति गुणकारी होने के कारण लोग इसे अपने फुलवारी में भी लगाते है । अमलतास का पेड़ करीब 8 से 12 मिटर ऊंचा होता है ।इसकी अधिकतम मोटाई एक से सावा मित्र तक होता है ।इसके पत्ते हरे और अंडाकार होते है । इसके बृक्ष में पतझड़ से जून तक इसमें फूल आते है जिसमें पांच पंखुड़िया होती है ।इसके फूल के रंग पिले होते है ।इसके फल एक से दो फुट लम्बे होते है । इस फल के अंदर छोटे छोटे खाने होते है ।प्रत्येक खाने के अंदर 2 से 3 बिज होते है । इस खाने के अंदर चिपचिपा काल गुदा होता है ।यही गुदा गुदा मुख्यतः औषधि के काम आता है । इसके अनेको फायदे है ।

इसके मुख्य फायदे निम्न है । 

 ( 1 ) कब्ज - अमलतास के फल के अंदर के गूदे को रात में एक ग्लास पानी में फुलाकर रख दें । और सबेरे खाली पेट बिना कुछ खाये इस पानी को छान कर पिले । दो चार दिनों में पुरानी से पुरानी कब्ज ठीक हो जाती है । दूसरी बिधि - 10 ग्राम अमलतास के गूदे , 5 ग्राम बड़ी हरड़ के छिलके को लगभग 250 ग्राम पानी रखकर आग पर पकाये जब पक कर एक चौथाई रह जाय तो 8 से 10 ग्राम गुड़ मिलाकर हल्का गुनगुने ही पी जाए । इसके पीने के दो - तिन घण्टे के बाद ही एक दस्त होगा जिसमे पुराना मल निकल जाता है और पेट साफ़ हो जाता है ।और कब्ज ठीक हो जाता है । 

 ( 2 ) बवासीर - बवासीर में अमलतास के 10 ग्राम गुदा , बड़ी हरड़ 5 ग्राम , मुनक्का ( बिज निकाली हुई 10 ग्राम एक ग्लास पानी में पकाये । जब पक कर एक चौथाई रह जाय तो इसे छान कर हल्का गुनगुने सुबह शाम पी जाए । इसे सात दिनों के अंदर पुरानी से पुरानी कब्ज ठीक हो जाता है और साथ ही बावसिर के मसे छोटे होने लगते है ।और इस तरह धीरे धीरे बावसीर समाप्त हो जाता है । 

 ( 3 ) मासिक - विकार - : अमलतास के गुदा 20 ग्राम सोंठ 10 ग्राम , निम् की छाल 5 ग्राम , । इन सबक कूट ले फिर इसमें 20 ग्राम मीठा मिलाकर 300 ग्राम पानी में पकाये जब पानी एक चौथाई रह जाए तो इसे आग से उतारकर छान ले ।और मासिक अवधि में इसे प्रतिदिन सुबह पीये ।इसके प्रयोग से मासिक खुलकर होगा और सभी तरह के मासिक विकार दूर हो जाएंगे । 

 (4 ) कफ में -: 20 ग्राम अमलतास के गुदा और 20 ग्राम मिश्री को पीस कर चटनी बनाले और दिन में तीन चार बार चटनी की तरह चाटे ।इसे कुछ ही दिनों में फेफड़ो में जमा कफ पिघल कर आसानी से निकल जाता है । 

 (5 ) गाँठ या सूजन में - अमलतास के गुदा 30 ग्राम , कपूर 2 ग्राम , जौ के आटां 30 ग्राम को तीसी के तेल में मिलाकर इसे गर्म करके किसी कपड़े पर फैलाकर गाँठ या सूजन पर बांधे ।कुछ ही दिनों में गाँठ बैठ जाएगा या पक कर बह जाएगा ।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

माहवारी विकार , योनि के घाव एवं लड़कियो के त्वचा गोरी , कोमल और सुंदर बनाने में अशोक के छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।


माहवारी विकार , योनि के घाव एवं लड़कियो के त्वचा गोरी , कोमल और सुंदर बनाने में अशोक के छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।


 अशोक का पेड़ 15 से 20 फुट लम्बा जो सालो भर हरा भरा होता है ।यह पुरे भारत में पाया जाता है ।

             इसे अलग अलग भाषाओ में अलग अलग नामो से जानते है । इसे संस्कृत में - रक्तपल्लव , हेमपुष्प । हिन्दी में - अशोक ।बंगाली में - आसोपालव । मराठी में - अशोषक । लैटिन में - जोनोसिया अशोका के नाम से जानते है ।

           अशोक के वृक्ष बहुत ही लाभदायक होता है ।इसके पत्ते का उपयोग घर में पूजा , समारोह आदि में शुभ मानकर दरवाजे पर सजावट के रूप में किया जाता है । बहुत से लोग अपने घर के दरवाजे पर भी इसे सुंदरता के लिए लगाते है ।

      इसके प्रमुख लाभ - 

  ( 1 ) माहवारी विकार में -स्त्रियों को माहवारी सम्बन्धी किसी भी प्रकार के गड़बड़ी में अशोक के छाल दूध में उबालकर ठंडा होजाने के बाद सुबह कुछ दिनों तक नियमित पिने से माहवारी संबन्धी सारी विकार समाप्त हो जाता है साथ ही गर्भाशय की सूजन एवं दर्द भी मिट जाता है । 


 ( 2 ) सुंदरता बढ़ाने के लिए - 2 चम्मच अशोक के छाल के रस , 2 चम्मच सरसों के तेल , एवं 1 चम्मच गेहूं के आटां । इन सबको खूब बढ़िया से मिलाले फिर इसमें थोड़ी सी दूध दाल कर हाथ , मुँह पर उबटन की तरह लगाये ।लगाने के 15 से 20 मिनट के बाद पानी से धो ले ।इसके नियमित प्रयोग से कुछ ही दिनों में त्वचा गोरी , कोमल और सुंदर हो जायेगी ।


 ( 3 ) योनि के घाव - अशोक के पेड़ के छाल को पानी में उबाल कर उसे छान कर योनि के घाव को धोये कुछ ही दिनों में योनि की घाव ठीक हो जाएगें ।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

इमली के बीज से मर्दाना ताकत बढ़ता है ।


इमली के बीज से मर्दाना ताकत बढ़ता है ।


 इमली वैसे तो पुरे भारतवर्ष में मिलता है । इमली का पेड़ लगभग 10 से 50 फुट लम्बा होता है इसके पत्ते निम् के पत्ते की तरह होते है । इसके फल बहुत ही खट्टे होते है ।यह स्त्रियों को बहुत ही पसन्द है ।इमली के पत्ते छाल एवं फल भी बहुत लाभदायक होता है ।पर इमली के बिज के गुण के बारे में बहुत ही कम लोगो को जानकारी है । इमली के बीज बहुत लाभकारी होता है । इमली के फल को प्रयोग में लाने के बाद के बाद प्रायः लोग इसके बिज को फेक देते है ।

 इमली के बिज के फायदे - मर्दाना शक्तिवर्धक , स्वप्न दोष , वीर्यवर्धक और स्त्रियों के प्रदर रोग में भी बहुत फायदेमंद होता है । 

 इसके प्रयोग के प्रथम बिधि -: इमली के बीज 100 ग्राम लेकर इसे भून लीजिये। भून लेने के बाद इसे कूटकर छान ले । इसमें बुरा खांड 100 ग्राम मिला ले। इसके दो चम्मच प्रतिदिन सुबह गर्म दूध से ले। यह स्वप्न दोष और मर्दाना ताकत बढ़ाने में लाभदायक हैं। स्त्रियों का प्रदर भी इससे ठीक होता हैं। इसके प्रयोग के एक दूसरी बिधि -:  इमली के बीज100 ग्राम को 2 से 3 दिन पानी में भिगोये और फिर इसके छिलके को उतार कर छाया में सुखाले। सूख जाने के बाद इसे महीन पीस ले और और उस चूर्ण में समान भाग मिश्री मिलाकर पीसे ले ।फिर एक चौथाई चम्मच प्रतिदिन सुबह शाम दूध के साथ इस चूर्ण को ले। एक से दो महीने के सेवन से शीघ्र पतन दूर होगा, वीर्य गाढ़ा एवं मर्दाना ताकत में अभूतपूर्व बृद्धि हो जाती है ।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

लहसुन पुरुषो के लिए यौन शक्ति दायक है ।



लहसुन पौरुष बल को बढ़ाता है साथ ही शरीर को पुष्ट करता है । घरेलू नुस्खे

लहसुन पुरुषो के लिए यौन शक्ति दायक है ।यह किसी भी किरने ( पसारी )के दुकान पर मिला आसानी से मिलजाता है । मर्दाना ताक़त, जोड़ो का दर्द , (सन्धिवात ), सायटिका, हिचकी, श्वास, सिर दर्द, अपस्मार, गुल्म, उदर रोग, प्लीहा, कृमि, शौथ, अग्निमान्ध, पक्षाघात, खांसी, शूल आदि के लिए उत्तम औषिधि – लहसुन पाक। लहसुन पाक शीतकाल में पोष्टिक आहार के रूप में वाजीकारक योग हैं। विवाहित पुरुषों के लिए यौन शक्तिदायक वृद्धक तो होता ही है साथ ही शरीर की सप्त धातुओं को पुष्ट और सबल करके शरीर को सुडौल और बलवान बनाने वाला भी है। आइये जाने लहसुन पाक तैयार करने की विधि।

 लहसुन पाक तैयार करने की विधि - 100 ग्राम लहसुन की कलियोँ को छिलका अलग करके छोटे-छोटे टुकड़े कर लें।और एक लीटर दूध में एक गिलास पानी डाल कर लहसुन के सभी टुकड़े डाल दें और आग पर गरम होने के लिए रख दें। जब दूध गाढ़ा हो जाये और तब उतार कर ठंडा कर लें और उसे पीसकर लुगदी बना लें।फिर शुद्द देशी घी में इस लुगदी को धीमी आंच पर पकाये । जब लाल हो जाये तब इसे उतार लें । अब इसमें आवश्यकतानुसार शक्कर की चाशनी तैयार करें। भुनी हुई लुगदी और 1 ग्राम केशर , 2 ग्राम लौंग , 2 ग्राम जायफल , दालचीनी 2 ग्राम , और सौंठ 5 ग्राम इन सबको बारीक़ पीसकर चाशनी में डाल दें और भली-भांति मिला लें और थाली में फैला कर जमा लें अब आपका लहसुन पाक तैयार हो गया । प्रयोग विधि यह लहसुन पाक रात को सोने से पहले एक चम्मच गुनगुने दूध के साथ कम से कम दो महीने तक सेवन करे । इसके सेवन से जोड़ो का दर्द , सायटिका , हिचकी , श्वास , सिर दर्द, गुल्म , उदर रोग , प्लीहा ,कृमि ,शौथ , अग्निमान्ध, पक्षाघात, खांसी, शूल, आदि अनेक रोगों को निरोगी बनाने में सहायक होता है तथा स्नायविक संस्थान की कमजोरी, व् यौन शिथिलता दूर करके बल प्रदान करता है। एसे रोगों से ग्रस्त रोगी के अलावा यह लहसु पाक प्रौढ़ एवम वृद्ध स्त्री पुरुषों के लिए शीतकाल में सेवन योग्य उत्तम योग है।

इसका सेवन यथा सम्भव गर्मी के मौसम में न करे ।

ह्रदय रोगी के लिये अर्जुन का छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।



ह्रदय रोगी के लिये अर्जुन का छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।


 अर्जुन का पेड़ लगभग 80 फुट तक लम्बा होता है ।इसका छाल सफेद होता है और अंदर से गुलाबी होता है ।इसके पत्ते लगभग 2 इंच चौड़े और 5 से 6 इंच लम्बे होते है । वैसे तो अर्जुन का पेड़ पुरे भारत में पाया जाता है ।पर बहुतायत मात्रा में अर्जुन के पेड़ हिमालय के तराई क्षेत्र , उत्तर प्रदेश , बिहार , मध्य प्रदेश , एवं मुम्बई में मिलता है ।

   भारत के अलग अलग प्रदेशो में अलग - अलग नामो से जाना जाता है ।इसे संस्कृत में - ककुभ, अर्जुन , पार् हिंदी में- कोह , अर्जुन । मराठी में - अर्जुन सादड़ा ।तमिल में - मरुतै । तेलगु में - तेल्ल - मदिद ।लैटिन में - टर्मिनेलिया अर्जुना आदि नामो से जाना जाता है ।

 वैसे तो इस पेड़ के छाल बहुत ही लाभकारी होता है । यह शक्तिदायक , पुष्टिदाता , प्रमेह और रक्तपितनाशक है ।यह नाड़ियों की क्षीणता , हड्डियों के चोट - टूट आदि में बेहद लाभदायक होता है । ह्रदय रोगी के लीये बहुत ही लाभदायक होता है ।

 प्रमुख फायदे - 

( 1 ) ह्रदय रोग में - अर्जुन के छाल दूध में पकाकर आवश्यकतानुसार मिश्री मिलाकर पीये ।ह्रदय रोग में बहुत ही लाभ होता है ।इसे दिल की गति स्वभाविक होता है । दूसरी बिधि - अर्जुन के छाल को पानी में चाय की तरह उबालकर इसे हल्का गुनगुने होने के बाद सुबह चाय की तरह पीये ।इसे हार्ट के मरीज को बहुत ही फायदा होता है ।और धीरे -धीरे हार्ट सही काम करने लगता है ।


 ( 2 ) घाव - किसी भी प्रकार के पुराने घाव पर अर्जुन की छाल को पानी में उबाल कर काढ़ा बनाले ।और इसे छान कर घाव को अच्छी तरह से धोएं । इसे घाव कीटाणु रहित हो जाता है । फिर घाव पर कोई मरहम लगादे । 

 ( 3 ) हड्डी टूटना - अर्जुन की छाल को पीस कर रख ले । अर्जुन के छाल लगभग तीन ग्राम , 5 ग्राम चीनी , 5 ग्राम घि के साथ सुबह - शाम खाये । हड्डी टूटने पर अन्य दवा के साथ इसके सेवन से हड्डी बहुत ही जल्द जूट जाता है और हड्डी को मजबूती प्रदान करता है ।

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

स्त्रियों के रक्त प्रदर में अडूसा एक चमत्कारी औषधि है


स्त्रियों के रक्त प्रदर में अडूसा चमत्कारी औषधि है । अडूसा ( Malabar nut tree ) के गुण  


 अडूसा एक चमत्कारी औषधि है । अडूसा का पौधा छोटा और अनेक शखाओ वाला झाड़ीनुमा होता है ।इसका तना मजबूत होता है । पत्तिया 5 से 7 इंच लम्बी और 2 से 3 इंच तक चौड़ी और आगे की ओर नुकीली होती है ।इसमें सफेद रंग के फूल गुच्छो के रूप में शरद ऋतू में आते है ।इसका फल आगे से मोटा व पीछे से चपटा और चार बिज वाला होता है । 

संस्कृत में - वासक , बाजदन्त । मराठी में- अडुलसा ।बंगाली में- वाकस ।गुजराती में - आडुशो । फ़ारसी में - ख्वाजा ।हिंदी में अडूसा । और लैटिन में - अधाटोडा वासिका कहते है ।
 यह पूरे भारत में खण्डहरों , नदी - तलाबो , सुनसान इलाको में स्वंय उग आता है । यह मुख्य रूप से यह हिमालय के पास तराई वाले इलाको बिहार , उत्तर प्रदेश , बंगाल , मध्य भारत में पाये जाते है । अडूसा कसैला , लघु , स्वर व ह्रदय को हितकर , कफ - पित , रक्त पित्त , कृमी , क्षय रोग , ज्वर , प्रमेह , रक्त विकार और कमला का नाश करने वाला होता है । इसके पत्ते छाल कब्ज , अजीर्ण , खांसी , प्रसूता के कष्ट में लाभकर होता है ।

 प्रमुख फायदे :- 

(1 ) सर दर्द - अडूसा के थोड़ी सी सुखी पत्ती को पानी में डाल कर उबाले जब पानी उबल जाय तो उसमे आवश्यकतानुसार दूध और चीनी डाल कर चाय बनाले । और छान कर पी ले । इस तरह सुबह शाम चाय पिने से अकसर सर दर्द होने वाला या बना रहने वाला सिरदर्द ठीक हो जाता है । 

 ( 2 ) खांसी - अडूसा के पत्ते का अर्क निकाल कर इसमें जरा सा नमक दाल कर गुनगुना क्र पिये ।इसे खांसी मिट जाती है 

 ( 3 ) जुकाम - अडूसा के एक कप चाय में पिसी हुई काली मिर्च 1 चुटकी , पिसी मिश्री एक चम्मच , और एक चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह शाम ले इसे जुकाम समाप्त हो जाता है ।

 ( 4 ) मुँह के छाले - एक लीटर पानी में अडूसा के 20 ग्राम पत्ता और 20 ग्राम जड़ के छाल को दाल कर उबाले । उबल जाने के बाद जितना शन हो जाय उतना गर्म पानी से दिन में तीन चार बार कुल्ला करने से मुँह के छाले ठीक हो जायेंगे ।

 ( 5 ) टी.बी. की खांसी - अडूसे की कोमल व ताजा पत्तियां लेकर अपने हाथो से मसलकर किसी चौड़े मुख के कांच के वर्तन में डाल दे । पत्तियो से दोगुनी चीनी भी दाल कर उसे खूब हिला डोला कर कपड़े से वर्तन का मुंह बन्द कर लगभग 45 दिनों तक धुप में रखे । ततपश्चात इस अडूसे के गुलकन्द को सुबह शाम एक चम्मच ले इसे टी.बी. रोगी का खांसी एवं पुरानी से पुरानी खांसी ठीक हो जाती है ।

 ( 6 ) रक्त - पित्त - 10 ग्राम अडूसे के पत्ते के रस के साथ 5 ग्राम चीनी मिलाकर 2 से 3 बार चाटने पर शर्तिया रक्त - पित्त मिट जाता ।

 ( 7 ) फोड़ा - फोड़ा निकलना शुरू ही हुआ हो तो उस पर अडूसा के पत्ते को पीस कर लेप लगाने से फोड़ा बैठ जाता है । ( 8 ) स्त्रियों में रक्त प्रदर - 10 ग्राम अडूसे के पत्ते का रस और 10 ग्राम मिश्री को मिलाकर रोजाना 3 से 4 बार लेने से स्त्रियों का रक्त प्रदर 7 से 8 दिनों में समाप्त हो जाता है ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

मुलहठी ( Liquorica root ) के गुण



मुलहठी ( Liquorica root ) के गुण

मुलहठी को संस्कृत में - मधुयष्टि, यष्टिमधु । हिंदी में - मुलहठी , मुलेठी , मौरेठी । मराठी में - जेष्ठिमध । तमिल में -अतिमधुरम । गुजराती में - जेठीमध ।अरबी में - अस्लुस्सुस और लैटिन में - गिलसिराइज ग्लेब्रा के नाम से जानते है । 


          मुलहठी का पेड़ 2 से 4 फुट तक ऊँचा और झाड़ीनुमा होता है ।इसके पत्ते आयताकार नुकीले होते है ।इसके फूल गुलाबी और खून के रंग के होते है ।इसके चपटे फल में दो से चार बिज होते है ।इसकी जड़े लम्बी , मोटी , मटमैली और अंदर से कुछ पिली होती है । इसकी जड़ का ही अधिक प्रयोग होता है । यह भारत में जम्मू , कश्मीर में बहुतायत मात्रा में मिलता है । इसके अलावे ईरान , अरब , और यूरोप में भी मिलता है । 


यह मधुर , शीतल , त्रिदोष नाशक , मृदुरेचक , वीर्यवर्ध्दक , वातपितनाशक , है । यह खांसी , जुकाम , स्वर की गड़बड़ी , गले के रोग , चरम रोग , केशो के रोग , सूजन ,वमन , प्यास की अधिकता , आदि में बहुत ही लाभप्रद है ।मुलहठी का उपयोग अधिक मात्रा में नही करनी चाहिए । 


 खांसी में - मुलहठी के जड़ को पानी से साफ धोकर छोटे छोटे टुकड़े करके प्रत्येक दो से तीन घण्टे बाद इस वक टुकड़े को मुँह में डालकर चूसे ।इसे खांसी में बहुत ही जल्द आराम मिल जाता है । 

 पेशाब में रक्त आने पर - मुनाका 10 पीस मुलहठी 3 ग्राम दोनों को 250 ग्राम दूध में दाल कर पका ले । इसे आग से उतार कर ठंडा कर ले ।फिर मुनका की चबाकर खाजाये ।और दूध को पी जाए ।इसे थोड़ी ही देर में पेशाब खुलकर हो जाएगा । 

 पौरुष बल बढ़ाने के लिए - 5 ग्राम मुलहठी के चूर्ण को रात के सोने से पहले शुद्ध देशी घी के साथ चाट जाए ।इसे धातु पुष्ट होती है ।मर्दानी ताकत बहुत ही बढ़ जाती है ।इसका प्रयोग 40 से 45 दिनों लगतार करनी चाहिए । 

 दूध बढ़ाने के लिए - मुलहठी 50 ग्राम , शनतावर 200 ग्राम दोनों कूट - पीस कर चूर्ण बनाले ।इसमें से 20 ग्राम चूर्ण 250 ग्राम दूध और 250 ग्राम पानी में उबाले ।जब जल कर आधा हो जाय तो उसे ठंडा होने के बाद थोड़ी सी चीनी या मिश्री मिलाकर रोगी को पिलादे । इस तरह दो से तिन दिनों में ही माता के स्तनों में पर्याप्त दूध उतर जायेगा । मुलहठी के गुणों का आयुर्वेद में विस्तार से वर्णन है ।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

शतावर ( shtawawar )के गुण -पौरुष बल बढ़ाने और स्त्रियों का दूध बढ़ाने में रामबाण का काम करता है


शतावर ( shtawawar )के गुण










 इसका बहुत ही महत्व है ।बहुत से रोगों को दूर इसके सेवन से किया जा सकता है इसका विस्तार से वर्णन है । शतावर को संस्कृत में- शतावरी , शातमुलि ।हिंदी में - शतावर ।तमिल में - सडावरी । तेलगु में - चल्ला । लैटिन में एस्पेरेगस रेसिमोसस कहते है ।


 इसका पेड़ काँटेदार बेल की तरह होता है । इसकी शखाये चिकनी और तिकोनी होती है । इसके पत्ते आधा से एक इंच लम्बे होते है । जो की दो से छः पत्तो के गुच्छे के रुप में होते है ।इसके फूल छोटे , सुगन्धित , या गुलाबी रंग के होते है ।इसके फूल एक बार में हजारो की संख्या में आते है जिसे पूरा की पूरा पेड़ ढँक जाते है । इसके फल लाल रंग के गोल छोटे और चमकदार होते है । इसकी जड़े गुच्छे के रूप में होते है यही जड़े औषधि के रूप में काम आती है ।


 यह भारत के लगभग सभी समशीतोष्ण स्थानों में पायी जाती है । यह हिमालय एवं अरावली के पर्वत क्षेत्र में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है ।शतावर लगभग सभी किराने के दुकानों में मिल जायेगे ।


 फल गुण - यह मधुर , कटु , चिकनी , शीतल , पौष्टिक , वीर्यवर्ध्दक , बलकारक , नवयौवन प्रदायक होता है ।इसके सेवन से बलवीर्य में बृद्धि होती है और पुरुषो में मर्दाना ताकत बढ़ जाती है । यह स्त्रियों के गर्भाशय शक्ति प्रदान करती है और माता के स्तनों में दूध बढ़ाती है । यह मस्तिष्क , नेत्र , ह्रदय , नाड़ी आदि के समस्त रोगों को दूर करके उन्हें शक्ति प्रदान करती है ।


 प्रमुख फायदे - (1 ) पेशाब में रुकावट -40 ग्राम सुखी शतावर को कूट कर पानी के साथ पीस ले और उसे कपड़े से छान कर बराबर मात्र में दूध के साथ ले । इसे शीघ्र ही खुलकर पेशाब होने लगेगा । या ताज़ी शतावर का 25 ग्राम रस गाय के दूध के साथ पिलादे इसके पिलाने के कुछ ही देर में पेशाब चालु हो जाएगा ।


( 2 ) पौरुष बल बढ़ाने के लिये -( a ) 100 ग्राम सुखी शतावर को कूट कर महीन कपड़े से छान कर चूर्ण बनाले एवं 10 दिन सुबह नास्ते के बाद एक ग्लास दूध से ले ।इसे बल - वीर्य बढ़ जाता है ।


(b) 100 ग्राम कौंच के बिज , 100 ग्राम अश्वगन्धा , 100 ग्राम मुसली , 100 ग्राम शतावर सबको अच्छी तरह से कूट कर महीन चूर्ण बनाले और 5 - 5 ग्राम चूर्ण सुबह - शाम दूध के साथ ले ।इसे नपुंसकता , ताकत का अभाव , चिड़चिड़ापन , निराशा आदि की समस्या दूर हो जाती है ।काम इच्छा को तेज कर देती है । इसका सेवन गर्मी कदिनों में नही करनी चाहिये ।


( c ) सुखी शतावर 10 ग्राम , मिश्री 100 ग्राम दोनों को कूट क्र महीन चूर्ण बनाले ।और इसमेसे 5 ग्राम शुध्द देशी घी में मिलाकर चाट कर एक ग्लास दूध पि ले ।इसे स्वप्नदोष , शीघ्रपतन आदि समाप्त हो जाती है ।इसका सेवन गर्मी के मौसम में वर्जित है ।


 ( 2 ) बांझपन - सुखी शतावर का चूर्ण 5 ग्राम 10 ग्राम घी के साथ चाट कर एक ग्लास गुनगुना दूध पी ले ।इसका एक से डेढ़ माह के सेवन से ही स्त्रियों के गर्भाशय की समस्त विकृतियां दूर हो जाती है ।जिसे गर्भ स्थापना में सहयोग मिलती है ।


 (3) स्त्रियों के दूध बढ़ाने के लिये -200 ग्राम शतावर को कूट कर चूर्ण बनाले ।और इसे प्रतिदिन 5 ग्राम दूध के साथ सुबह शाम दे ।इसे माता के स्तनों का दूध बढ़ जाता है ।प्रसव में आई कमजोरी भी दूर हो जाती है ।

धतूरा ( thorn apple ) धतूरे के बिज सेक्स पावर को बढ़ाता है ।


धतूरा ( thorn apple ) धतूरे के बिज सेक्स पावर को बढ़ाता है ।

धुतुर प्राय समूच भारत में पाया जाता है ।इसका पौधा 3 से 4 फुट ऊँचा होता है ।इसकी पत्तिया 6 - 7 इंच लम्बा आगि से नुकीली होता है ।इस पर सफेद और नील रंग के फूल आते है । इसके फल हरे रग के कटहल की तरह अनेक काँटेदार होता है ।इसमें अनेक छोटे छोटे चीपटे सफेद या भूरे बिज होते है ।धतूरा दो प्रकार के होता है काल धतूरा , सफेद धृतरा । दोनों के गुण सम्मान होते है ।

      इसे संस्कृत में कनक , धृत , धत्तूर , मातुल ।हिंदी में - धतूरा । मराठी में धोतरा । लैटिन में इसे दतूरा स्ट्रोमोनियम कहते है ।

 गुण - यह ज्वर , घाव , कृमी , खुजली , कुष्ट , दामा , जूं आदि का नाश करने वाला होता है ।     

फायदे -  (1) पौरुष बल के लिए - धतूरे के बिज और काली मिर्च दोनों बराबर बराबर लेकर मिला ले इसे कूट कर छान ले ।फिर इसे पानी के द्वारा छोटी छोटी गोली बनाले । दो गोली प्रति दिन सोने के पहले दूध के साथ ले ।इसे स्वप्नदोष , शीघ्रपतन , धातुस्राव आदि रोग दूर होजाते है । 

 नोट : इसे गर्मी के मौसम में न ले ।एवं प्रयोग काल में गरिष्ठ भोजन न खाये । 

   ( 2 ) पेट में कीड़े - 150 ग्रस्म में मठ्ठे में धतूरे के ताजे पत्ते के 5 बून्द रस टपका कर सुबह पि जाए । दो से तीन दिनों के प्रयोग के बाद पेट के कीड़े स्वतः मल के रास्ते मर कर बाहर आजायेगें । 

 ( 3 ) पुराना जुकाम - धतूरे के बिज 50 ग्राम आधा लीटर पैनी में उबाले । जब पैनी लगभग 150 ग्रामबचे तो उसे आग से उतार कर छान ले । फिर उसमें 50 ग्रस्म मुनाक दाल कर आग पर चढ़ा दे जब सारा पानी सुख जाय तो मउनके को धुप में सुख ले और आधा मुनाक रोज खाये इसे जुकाम आवश्य ठीक हो जायेगा ।

 (4 )स्तन की सूजन - धतूरे के पत्ते के ऊपर पिसी हुई हल्दी लगाले ।फिर उसको हल्का सा गर्म करके सूजन वेस्ली जगह पर बांध दे ।दो तीन तक प्रयोग करने से स्तन का सूजन और दर्द समाप्त हो जाता है ।

 नोट : धतूरा नशीला औए जहरीला होता है अतः कभी भी सीधे न खाये ।

आँवला (indian goose berry )के गुण - पौरुष बल बढ़ाता है आँवला





आँवला (indian goose berry )के गुण - पौरुष बल बढ़ाता है आँवला


आँवला इस धरती का अमृत फल है । आँवला एक ऐसा फल है जिसके हजारो गुण है ।यह लगभग पुरे विश्व में कहीँ कम तो कहीं बहुतायत मात्रा में पाया जाता है । आँवला को संस्कृत में धात्री फल , आमलकी ।हिंदी में - आँवला , आमला । बंगाली में - अम्ला । फ़ारसी में - आमलह ।अरबी में - आमलज । लैटिन में - एम्बेलिक आफिसिनेलिस के नामो से जाना जाता है । आँवला का पेड़ मध्यम अकार का अनेक शाखाओं वाला होता है ।इसके पत्ते हरे और यह इमली के पत्ते की तरह होता है । यह बसन्त ऋतू में हराभरा हो जाता है और इसमें पिले रंग के फूल आते है । जुलाई -अगस्त में इस पर पीलापन लिये हुऐ हरे रंग के गोल चिकने फल आते है ।जिन पर छः धारिया होती है । इसकी गुठली कड़ी होती है ।इसका स्वाद कषाय और खट्टा होता है । यह कषाय , हल्का , शीतल , खट्टा , मधुर , त्रिदोष नाशक , दीपन , वीर्यवर्द्धक , रेचक , दाहनाशक , और जवानी को स्थिर रखनेवाले होते है । इसमें विटामिन c भरपूर मात्रा में पाये जाते है ।जो आँवले के सूखने या उबालने पर भी नष्ट नही होता है । आयुर्वेद में इसका बहुत सम्मान है और इसके हजारो फायदे का वर्णन है । वैसे तो आँवले के हजारो फायदे है । इनके प्रयोग से हजारो रोगों का सफल इलाज किया जाता है । आँवले के फल एवं पत्ती दोनों ही लाभकारी होते है ।इसके कुछ निम्न फायदे का वर्णन करता हूँ जो इस प्रकार है ।

प्रयोग विधि :- 

( 1 ) खुनी पेचिश - 2 ग्राम आँवले के पत्ती कोपिस कर इसमें जरा सी गुड़ मिला कर प्रतिदिन दो तीन बार चाटे इसे कुछ ही दिनों में खुनी पेचिश जड़ से समाप्त हो जायेगी । 

 ( 2 )हाथ - पैरो में जलन - शाम को आँवला को कुचल कर पानी में भिगो दे । अगले दिन इसे हाथ पैर तीन - चार बार धोये । साथ ही आँवले के चूर्ण को थोड़े से शहद मिलाकर सुबह शाम चाटे । कुछ ही दिनों में हाथ पैरो का जलन समाप्त हो जाएगा । ( 3 ) पित्त की दाह और गर्मी -आँवले की चटनी बनाकर चाटने या शिकंजी पिने से पित्त दाह और गर्मी नष्ट हो जाती है । 

 ( 3 ) लू और गर्मी से बचाव - गर्मियों के दिनों में सुबह शाम आँवले का एक एक मुरब्बा खाये पुरे गर्मी के मौसम में इसे खाये । इसे लू से बचाव होता ही है साथ ही दिमाग ठंडा रखता है । 

 ( 4 ) दांत निकलते समय - जिन बच्चों को दांत निकलने को है उन बच्चों के मसूढ़ों पर आँवले के रस दिन में दो तीन बार मल दे इसे दांत बिना परेशानी के निकल जायेगे । 

 ( 5 ) स्वप्नदोष - सूखे आँवले के चूर्ण 100 ग्राम , चीनी या मिश्री 200 ग्राम इन्हें मिलाकर रखले ।प्रत्येक दिन सुबह बिना कुछ खाये एक छोटी चम्मच चूर्ण खाकर पानी पि ले ।पन्द्रह बिस दिनों में स्वप्न दोष आना बन्द हो जाएगा ।

 ( 6 ) पुरषो में शारीरि ताकत और मर्दानी ताकत बढ़ाने के लिये - * सोंठ - 50 ग्राम *असगन्ध -150 ग्राम * गठली रहित आँवले का चूर्ण - 200 ग्राम * मिश्री - 200 ग्राम । इन सबको कूट पीस कर छान ले । प्रतिदिन दो से चार चम्मच चूर्ण सुबह शाम खा कर पानी या दूध पी ले । इसे प्रमेह प्रदर , कमर दर्द , सुस्ती दूर करके , वीर्य ताकत , पौरुष बल , शारीरिक ताकत , बुद्दि और स्फूर्ति बढ़ाता है । इसे दिमागी काम करने वाले जरूर खाये । इसके सेवन से बाल चमकीले होते है ।बाल झड़ना रुक जाता है । बाल धीरे धीरे काले होजाते है । 

 नोट - 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे इस चूर्ण को न खाये । आँवले को आयुर्वेद में अमृत फल के नाम से जाना जाता है ।आँवले को देव फल भी कहते है ।